भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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॥ श्रीहरिः ॥

विषय-सूची

विषयपृष्ठ
१—शान्तिपाठ२६

प्रथम अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

  • २—सम्बन्ध-भाष्य | ३०
  • ३—अश्वके अवयवोंमें कालादि-दृष्टि | ३६
  • ४—अश्वमेधसम्बन्धी महिमासंज्ञक ग्रहादिमें अहरादिदृष्टि | ४५

द्वितीय ब्राह्मण

  • ५—अश्वमेध-सम्बन्धी अग्निकी उत्पत्ति | ४८
  • ६—जलसे विराट्रूप अग्निकी उत्पत्ति | ६७
  • ७—विराट्रूप अग्निके अवयवोंमें प्राचीदिगादि-दृष्टि | ६६
  • ८—संवत्सर और वाक्‌की उत्पत्ति | ७२
  • ९—ऋगादिकी उत्पत्ति और मृत्युके अत्तृत्वका उपन्यास | ७५
  • १०—प्रजापतिकी यज्ञकामना और उसके प्राण एवं वीर्यका निष्क्रमण | ७८
  • ११—अश्वमेधोपासना और उसका फल | ८०

तृतीय ब्राह्मण

  • १२—देव और असुरोंकी स्पर्धा, देवताओंका उद्गीथ-सम्बन्धी विचार | ८८
  • १३—वाक्‌का उद्गान और उसका पापविद्ध होना | १०७
  • १४—प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मनका उद्गान तथा उनका पापविद्ध होना | १११
  • १५—मुख्य प्राणका उद्गान, उसका पापविद्ध न होना तथा उसकी उपासनाका फल | ११५
  • १६—मुख्य प्राणका आङ्गिरसत्व | ११६
  • १७—प्राणकी शुद्धताका प्रतिपादन | १२१
  • १८—प्राणोपासकसे मृत्यु दूर रहता है—इसकी उपपत्ति | १२४
  • १९—प्राणद्वारा वागादिका अग्न्यादि देवभावको प्राप्त कराया जाना | १२७
  • २०—प्राणका अन्नाद्यागान | १३१
  • २१—प्राणका सर्वपोषकत्व और उसकी इस प्रकारकी उपासनाका फल | १३३