भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 102
९६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
नामादिप्रतिपत्तिःप्रतिमादिवदेव, न तु नामाद्येव ब्रह्मेति । यथा स्थाणावनिर्ज्ञाते न स्थाणुरिति, पुरुष एवायमिति प्रतिपद्यते विपरीतम्, न तु तथा नामादौ ब्रह्मदृष्टिर्विपरीता ।दृष्टिका विधान किया जाता है। प्रतिमादिके समान नामादिका ज्ञान भी ब्रह्मके आलम्बन रूपसे ही होता है, नामादि ही ब्रह्म है, ऐसा ज्ञान नहीं होता। जिस प्रकार स्थाणुका ज्ञान न होनेपर 'यह स्थाणु नहीं है, पुरुष ही है' ऐसा विपरीत ज्ञान होता है, नामादिमें वैसी विपरीत ब्रह्मदृष्टि नहीं होती।
ब्रह्मदृष्टिरेव केवला नास्ति ब्रह्मेति चेत् । एतेन प्रतिमाब्राह्मणादिषु विष्ण्वादिदेवपित्रादिदृष्टीनां तुल्यता ।पूर्वपक्षी—किंतु इससे 'केवल ब्रह्मदृष्टि ही होती है, वस्तुतः ब्रह्म है नहीं' यही बात सिद्ध होती है। प्रतिमा और ब्राह्मणादिमें विष्णु आदि देव और पितृ आदि दृष्टियाँ भी इसीके समान हैं।
न; ऋगादिषु पृथिव्यादिदृष्टिदर्शनात् । विद्यमानपृथिव्यादिवस्तुदृष्टीनामेव ऋगादिविषये क्षेपदर्शनात् । तस्मात्तत्सामान्यान्नामादिषु ब्रह्मादिदृष्टीनां विद्यमानब्रह्मादिविषयत्वसिद्धिः ।सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ऋगादिमें पृथिवी आदि दृष्टि देखी जाती है अर्थात् ऋगादि विषयोंमें पृथिवी आदि विद्यमान वस्तुविषयक दृष्टियोंका ही आरोप देखा गया है। अतः उनसे समानता होनेके कारण नामादिमें जो ब्रह्मादिदृष्टि हैं उनकी विद्यमान ब्रह्मादिविषयता सिद्ध होती है।
एतेन प्रतिमाब्राह्मणादिषु विष्ण्वादिदेवपित्रादिबुद्धीनां च सत्यवस्तुविषयत्वसिद्धिः । मुख्यापेक्षत्वाच्च गौणत्वस्य । पञ्चाग्न्या-इससे प्रतिमा और ब्राह्मणादिमें विष्णु आदि देवदृष्टि और पित्रादि दृष्टियोंका भी सत्यवस्तुविषयक होना सिद्ध होता है, क्योंकि गौणता तो मुख्यकी अपेक्षासे होती है। जिस