भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 1402 में से

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ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९५

| श्‍वरदेवतादीनामपि अयथार्थानामेव चेद् ग्रहणं श्रुतितः, अनर्थप्राप्त्यर्थं शास्त्रमिति ध्रुवं प्राप्नुयाल्लोकवदेव, न चैतदिष्टम्; तस्माद्यथाभूतानेव आत्मेश्वरदेवतादीन् ग्राहयत्युपासनार्थं शास्त्रम् । | आत्मा, ईश्वर और देवतादिका भी अयथार्थरूपसे ही ग्रहण होता तब तो लोककी तरह शास्त्र भी अनर्थप्राप्तिके ही लिये है—ऐसी आपत्ति अवश्य हो सकती थी। परंतु यह इष्ट नहीं है; अतः शास्त्र उपासनाके लिये यथार्थ आत्मा, ईश्वर और देवतादिको ही ग्रहण कराता है। | | नामादौ ब्रह्मदृष्टिदर्शनादयुक्तमिति चेत्स्फुटं नामादेरब्रह्मत्वम्, तत्र ब्रह्मदृष्टिं स्थाण्वादाविव पुरुषदृष्टिं विपरीतां ग्राहयच्छास्त्रं दृश्यते । तस्माद्यथार्थमेव शास्त्रतः प्रतिपत्तेः श्रेयः इत्ययुक्तमिति चेत् ? | शङ्का—नामादिमें ब्रह्मदृष्टि देखी जानेके कारण तुम्हारा कथन ठीक नहीं है। नामादिका अब्रह्मत्व स्पष्ट ही है। उनमें स्थाणु आदिमें पुरुषदृष्टिके समान शास्त्र विपरीत ब्रह्मदृष्टिका ग्रहण कराता देखा जाता है। अतः शास्त्रसे यथार्थ ज्ञान होनेके कारण ही श्रेयकी प्राप्ति होती है—ऐसा कहना ठीक नहीं। | | न, प्रतिमावद्भेदप्रतिपत्तेः। नामादावब्रह्मणि ब्रह्मदृष्टिं विपरीतां ग्राहयति शास्त्रं स्थाण्वादाविव पुरुषदृष्टिम्, इति नैतत् साध्ववोचः। कस्मात् ? भेदेन हि ब्रह्मणो नामादिवस्तुप्रतिपन्नस्य नामादौ विधीयते ब्रह्मदृष्टिः प्रतिमादाविव विष्णुदृष्टिः । आलम्बनत्वेन हि | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रतिमाके समान उनका ब्रह्मसे भेदज्ञान रहता है। स्थाणु आदिमें पुरुषदृष्टिके समान शास्त्र नामादि अब्रह्ममें विपरीत ब्रह्मदृष्टिका ग्रहण करता है—यह तुमने ठीक नहीं कहा। क्यों ? क्योंकि जिसे ब्रह्मसे नामादि वस्तुका भेदरूपसे ज्ञान है उसीके लिये प्रतिमादिमें विष्णुदृष्टिके समान नामादिमें ब्रह्म- |

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