भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 100
६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
उपास्यत्वे स्तुत्यर्थत्वोपपत्तेः।तो, उपास्य होनेके कारण, उसकी स्तुतिके लिये भी हो सकती है।
न; अविपरीतार्थप्रतिपत्तेः श्रेयःप्राप्त्युपपत्तेर्लोकवत्। यो ह्यविपरीतमर्थं प्रतिपद्यते लोके स इष्टं प्राप्नोत्यनिष्टाद्वा निवर्तते, न विपरीतार्थप्रतिपत्त्या। तथेहापि श्रौतशब्दजनितार्थप्रतिपत्तौ श्रेयः-प्राप्तिरुपपन्ना न विपर्यये। न चोपासनार्थश्रुतशब्दोत्थविज्ञान-विषयस्य अयथार्थत्वे प्रमाणमस्ति। न च तद्विज्ञानस्यापवादः श्रूयते। ततः श्रेयःप्राप्तिदर्शनाद्यथार्थतां प्रतिपद्यामहे; विपर्यये चानर्थ-प्राप्तिदर्शनात्। यो हि विपर्यये-णार्थं प्रतिपद्यते लोके, पुरुषं स्थाणुरित्यमित्रं मित्रमिति वा, सोऽनर्थं प्राप्नुवन्दृश्यते। आत्म-समाधान— ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि अविरुद्ध अर्थके ज्ञानसे ही श्रेयःप्राप्ति होनी सम्भव है; ऐसा ही लोकमें भी देखा जाता है। लोकमें जो पुरुष अविरुद्ध अर्थका ज्ञान रखता है वही अभीष्ट प्राप्त करता है और अनिष्टसे बचता है। विपरीत अर्थके ज्ञानसे ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार यहाँ भी श्रुतिके शब्दसे निकलनेवाले अर्थके ज्ञानसे ही श्रेयःप्राप्ति होनी सम्भव है, विपरीत अवस्थामें नहीं। इसके सिवा उपासनाका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके शब्दसे होनेवाले विज्ञानके विषयके मिथ्या होनेमें कोई प्रमाण भी नहीं है। श्रुति उस विज्ञानका कहीं अपवाद भी नहीं करती। अतः उससे श्रेयःप्राप्ति दिखायी देनेसे हम उसकी यथार्थता मानते ही हैं, क्योंकि इससे विपरीत माननेमें अनर्थकी प्राप्ति देखी जाती है। लोकमें जो पुरुष वस्तुको विपरीत-भावसे ग्रहण करता है, जैसे पुरुष-को स्थाणु अथवा शत्रुको मित्र समझता है, वह अनर्थको प्राप्त होता देखा जाता है। यदि श्रुतिसे