भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 99

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९३


जिदेव'' (छा० उ० १ । ३ । २८) इति च श्रुतेः; प्राणस्य वागादीनां च शुद्धयशुद्धिवचनात् । न ह्यनुपास्यत्वे प्राणस्य शुद्धिवचनं वागादीनां च सहोपन्यस्तानाम्‌अशुद्धिवचनम् । वागादिनिन्दया मुख्यप्राणस्तुतिश्चाभिप्रेता उपपद्यते । 'मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते' इत्यादि फलवचनं च । प्राणस्वरूपापत्तेर्हि फलं तद्यद्वागाद्यग्न्यादिभावः ।लोकोंकी प्राप्ति करानेवाला ही है” इस श्रुतिसे और प्राण तथा वागादिकी शुद्धि और अशुद्धि बतलायी जानेसे भी यह विज्ञानका ही प्रकरण सिद्ध होता है। प्राणकी उपास्यता बतलाना अभीष्ट न होनेपर प्राणकी शुद्धिका प्रतिपादन करना और उसीके साथ जिनका उल्लेख किया गया है उन वागादिको अशुद्ध कहना सम्भव नहीं है। इससे वागादिकी निन्दाद्वारा मुख्य प्राणकी स्तुति अभिमत एवं युक्तियुक्त जान पड़ती है। 'मृत्युको पार करके प्रकाशित होता है' ऐसा इसका फलवचन भी है। वागादिको जो अग्न्यादिभावकी प्राप्ति है वह उनकी प्राणस्वरूपताकी प्राप्तिका ही फल है।
भवतु नाम प्राणस्योपासनम्,**शङ्का—**यहाँ प्राणकी उपासना भले ही हो, परंतु उसका विशुद्धि आदि गुणोंसे युक्त होना तो सम्भव नहीं है।
न तु विशुद्ध्यादिगुणवत्तेति ।यदि कहो कि श्रुतिप्रतिपादित होनेके कारण ऐसा हो सकता है, तो ऐसा होना सम्भव नहीं है, क्योंकि श्रुति
ननु स्याच्छ्रुतत्वात्; न स्यात्;

प्राणविज्ञानसे पूर्व उसका अनुष्ठान नहीं हो सकता; इसलिये वह अनित्य है। किंतु प्राणविज्ञान उसकी अपेक्षा नित्य है। क्योंकि 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते' इस नित्य पौर्णमासयागके समान 'य एवं वेद' (जो इस प्रकार जानता है) इस प्रकार नित्यवत् विज्ञान (उपासना) का श्रवण होता है। यहाँ प्रयाज आदि पौर्णमासीके प्रयोजक नहीं हैं, अपितु पौर्णमासी ही प्रयाज आदिकी प्रयोजिका है, उसी प्रकार प्राणवित्प्रयोज्य जप प्राणविज्ञानका प्रयोजक नहीं है, बल्कि प्राण-विज्ञान ही जपका प्रयोजक है। अतः वह जपसे पूर्वसिद्ध है।