भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 98
९२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| कर्म वक्ष्यमाणं मन्त्रजपलक्षणं विधित्स्यमानं “तदेतानि जपेत्” इति। ज्ञानं त्विदमेव निरूप्यमाणम्। | द्वारा किया जा सकता है। उनमें कर्म तो “तदेतानि जपेत्” इस वाक्यद्वारा जिसका विधान करना इष्ट है वह आगे कहा जानेवाला मन्त्रजपरूप है और ज्ञान तो वही है जिसका निरूपण किया जा रहा है। | | नन्विदंमभ्यारोहजपविशेषोऽर्थवादो न ज्ञाननिरूपणपरम्। | शङ्का—किंतु यह तो अभ्यारोह¹ मन्त्रजपकी विधिको शेषभूत अर्थवाद है, ज्ञाननिरूपण-परक नहीं है। | | न; ‘य एवं वेद’ इति वचनात्। | समाधान—यह बात नहीं है, क्योंकि यहाँ ‘जो ऐसा जानता है’ ऐसा वचन है। | | (प्राणोपासनवाक्यस्य अन्यशेषत्व-निरासः)<br>उद्गीथप्रस्तावे पुराकल्पश्रवणादुद्गीथविधिपरमिति चेन्न, अप्रकरणात्। | यदि कहो कि उद्गीथके प्रकरणमें [‘द्वया ह’ इत्यादि] पूर्वकल्पसम्बन्धी श्रुति होनेसे यह उद्गीथ-विधिपरक है²—तो यह बात भी नहीं है, क्योंकि यह उद्गीथका प्रकरण ही नहीं है। | | उद्गीथस्य चान्यत्र विहितत्वात्। | उद्गीथका विधान तो अन्यत्र (कर्मकाण्डमें) किया गया है। | | विद्याप्रकरणत्वाच्चास्य। | यह तो विद्या (उपासना) का प्रकरण है। | | अभ्यारोहजपस्य चानित्यत्वात्, एवंवित्प्रयोज्यत्वात्; | इसके सिवा अभ्यारोहजप अनित्य होता है, क्योंकि प्राणवेत्ताद्वारा ही वह अनुष्ठान करनेयोग्य है और | | विज्ञानस्य च नित्यवच्छ्रवणात्। “तद्धैतल्लोक- | प्राणविज्ञान नित्यवत् सुना गया है।³ तथा “यह प्राणविज्ञान |


१. जिसके जपसे देवभावकी सम्मुखतासे प्राप्ति हो उस मन्त्रजपका नाम अभ्यारोह मन्त्रजप है।
२. अर्थात् उद्गीथविधिको शेषभूत अर्थवाद है।
३. तात्पर्य यह है कि अभ्यारोहजपका अधिकार प्राणवेत्ताको ही होनेके कारण,

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