बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1033, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १०१९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| बन्धनात् प्रमुच्यते वाताद्यनेकनिमित्तम्; एवमेवायं पुरुषो लिङ्गात्मा लिङ्गोपाधिरेभ्योऽङ्गेभ्यश्चक्षुरादिदेहावयवेभ्यः सम्प्रमुच्य सम्यङ्निर्लेपेन प्रमुच्य, न सुषुप्तगमनकाल इव प्राणेन रक्षन्; किं तर्हि ? सह वायुनोपसंहृत्य, पुनः प्रतिन्यायं पुनः शब्दात् पूर्वमप्ययं देहाद् देहान्तरमसकृद् गतवान् यथा स्वप्नबुद्धान्तौ पुनः पुनर्गच्छति तथा पुनः प्रतिन्यायं प्रतिगमनं यथागतमित्यर्थः । प्रतियोनि योनिं योनिं प्रति कर्मश्रुतादिवशादाद्रवति । | बन्धनसे वायु आदि अनेकों कारणोंवश [फल] छूट जाता है; वैसे ही यह पुरुष-लिङ्गात्मा-लिङ्गोपाधिक जीव इन अङ्गोंसे अर्थात् शरीरके चक्षु आदि अवयवोंसे सम्प्रमुक्त होकर अर्थात् सम्यक्-निर्लेपभावसे छूटकर जिस प्रकार सुषुप्तावस्थामें जानेके समय प्राणके द्वारा इसकी रक्षा करता है, उस प्रकार नहीं; तो किस प्रकार ? प्राणवायुके सहित इन्द्रियोंका उपसंहार करके पुनः प्रतिन्याय—यहाँ 'पुनः' शब्दसे यह आशय है कि जिस प्रकार जीव पुनः-पुनः जागरित और स्वप्न-अवस्थाओंमें जाता है, उसी प्रकार पहले भी यह एक देहसे दूसरे देहमें बारंबार गया था; अतः पुनः प्रतिन्याय—जैसे पहले आया था वैसे ही दूसरे देहमें चला जाता है। प्रतियोनि अर्थात् अपने कर्म और विद्याके अनुसार प्रत्येक योनिमें जाता है। |
| किमर्थम् ? प्राणायैव प्राणव्यूहायैवेत्यर्थः । सप्राण एव हि गच्छति, ततः प्राणायैवेति विशेषणमनर्थकम्; प्राणव्यूहाय हि गमनं देहाद् देहान्तरं प्रति; तेन | इसलिये जाता है ? प्राणके लिये ही अर्थात् प्राणव्यूहके लिये ही। प्राणके सहित तो जाता ही है, ऐसी स्थितिमें 'प्राणायैव' यह विशेषण व्यर्थ होगा; लिङ्गात्माका जो एक देहसे दूसरे देहमें जाना है, वह प्राणके |