भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 1034
१०२०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
ह्यस्य कर्मफलोपभोगायार्थसिद्धिः, न प्राणसत्तामात्रेण। तस्मात्तादर्थ्यार्थं युक्तं विशेषणं प्राणव्यूहायेति ॥ ३६ ॥व्यूहकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही होता है; उसीसे इसके कर्मफलभोगकी सिद्धि होती है, केवल प्राणकी सत्तासे ही नहीं; अतः प्राण भोगका अङ्ग है—यह सिद्ध करनेके लिये 'प्राणव्यूहाय' यह विशेषण देना उचित है ॥ ३६ ॥

देहान्तरग्रहणका प्रकार

तत्रास्येदं शरीरं परित्यज्य गच्छतो नान्यस्य देहान्तरस्योपादाने सामर्थ्यमस्ति, देहेन्द्रियवियोगात्; न चान्येऽस्य भृत्यस्थानीया गृहमिव राज्ञे शरीरान्तरं कृत्वा प्रतीक्षमाणा विद्यन्ते; अथैवं सति कथमस्य शरीरान्तरोपादानमिति ?<br><br>उच्यते---सर्वं ह्यस्य जगत् स्वकर्मफलोपभोगसाधनत्वायोपात्तं स्वकर्मफलोपभोगाय चायं प्रवृत्तो देहाद्देहान्तरं प्रतिपित्सुः; तस्मात् सर्वमेव जगत् स्वकर्मणा प्रयुक्तं तत्कर्मफलोपभोगयोग्यं साधनं**शङ्का—**मरणकालमें इस शरीरको छोड़कर जानेवाले पुरुषमें दूसरे देहको ग्रहण करनेका सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि उसके देह और इन्द्रियोंका वियोग हो जाता है और राजाके लिये घर बनाकर प्रतीक्षा करनेवाले सेवकोंके समान इसके लिये दूसरा देह बनाकर प्रतीक्षा करनेवाले इन्द्रियादि हैं नहीं; ऐसी स्थितिमें इसका अन्य देह ग्रहण करना कैसे सम्भव हो सकता है ?<br><br>**समाधान—**बतलाते हैं—इस जीवके लिये सारा संसार अपने कर्मफलभोगके साधनरूपसे प्राप्त हुआ है और स्वकर्मफलभोगके लिये ही यह एक देहसे दूसरा देह प्राप्त करनेका इच्छुक होकर प्रवृत्त होता है; अतः स्वकर्मसे प्रेरित सारा ही जगत् उसके कर्मफलभोगके योग्य साधन होनेसे