बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1035, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२१
| कृत्वा प्रतीक्षत एव; "कृतं लोकं पुरुषोऽभिजायते" इति श्रुतेः; यथा स्वप्नाज्जागरितं प्रतिपित्सोः; तत् कथम् ? इति लोकप्रसिद्धो दृष्टान्त उच्यते— | उसकी प्रतीक्षा करता ही है; जैसा कि "पुरुष भूतपञ्चकद्वारा रचे हुए शरीरको सर्वतः व्याप्त करके उत्पन्न होता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है, जैसे कि स्वप्नावस्थासे जागरितस्थानको प्राप्त करनेकी इच्छावाले पुरुषका शरीर पहलेहीसे तैयार रहता है; सो कैसे ? इस विषयमें यह लोकप्रसिद्ध दृष्टान्त कहा जाता है— |
तद् यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूत-ग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्यय-मागच्छतीत्येवँ॒ हैवंविद्ँ॒ सर्वाणि भूतानि प्रति-कल्पन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥ ३७ ॥
सो जिस प्रकार आते हुए राजाको उग्रकर्मा एवं पापकर्ममें नियुक्त सूत और गाँवके नेतालोग अन्न, पान और निवासस्थान तैयार रखकर 'ये आये, ये आये' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार इस कर्मफलवेत्ताकी सम्पूर्ण भूत 'यह ब्रह्म आता है, यह आता है' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं ॥ ३७ ॥
| तत्तत्र यथा राजानं राज्याभिषिक्तमायान्तं स्वराष्ट्रे, उग्रा जातिविशेषाः क्रूरकर्माणो वा प्रत्येनसः प्रति प्रत्येनांसि पापकर्मणि नियुक्ताः प्रत्येनसस्तस्करादिदण्डनादौ नियुक्ताः सूताश्च ग्रामण्यश्च सूतग्रामण्यः---सूता वर्णसङ्करजातिविशेषा ग्रामण्यो ग्रा- | उसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार अपने राष्ट्रमें आते हुए राज्याभिषिक्त राजाकी उग्र-जातिविशेष अथवा क्रूर कर्म करनेवाले एवं प्रत्येना—प्रत्येक एनस् यानी पापकर्ममें नियुक्त अर्थात् चौरादिको दण्ड देने आदि कार्योंमें नियुक्त सूत और ग्रामणी—सूत एक वर्णसंकर जातिविशेष है तथा ग्रामणी ग्रामके नेताओं (मुखिया |