भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 104
९८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| न चानिश्चिता विपर्य्यस्ता वा परमात्मादिवस्तुविषया बुद्धिरुत्पद्यते । | है। उनसे परमात्मादि वस्तुविषयक अनिश्चित या विपरीत बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। | | अनुष्ठेयाभावादयुक्तमिति चेत्<br><br>(ज्ञानवाक्यानां क्रियार्थवाक्यै-रसमानत्व-शङ्कनम्)<br>क्रियार्थैर्वाक्यैस्त्र्यंशा भावनानुष्ठेया ज्ञाप्यतेऽलौकिक्यपि ।<br>न तथा परमात्मेश्वरादिविज्ञानेऽनुष्ठेयं किञ्चिदस्ति । अतः क्रियार्थैः साधर्म्यमित्ययुक्तमिति चेत् ? | पूर्व०—ज्ञानपरक वाक्योंद्वारा कोई अनुष्ठेयकर्म नहीं होता, इसलिये उन्हें क्रियार्थवाक्योंके समान कहना अनुचित है। क्रियार्थवाक्योंसे अलौकिक होनेपर भी [ फल, साधन तथा इतिकर्तव्यतारूपसे ] तीन¹ अंशोंवाली भावना अनुष्ठेयरूपसे बतलायी जाती है। परमात्मा एवं ईश्वरादि-विज्ञानमें वैसा कोई अनुष्ठेय कर्म नहीं होता। अतः विज्ञानवाक्योंकी जो क्रियार्थवाक्योंसे सधर्मता बतलायी गयी है वह ठीक नहीं है। | | न, ज्ञानस्य तथाभूतार्थविषयत्वात् ।<br><br>(तस्य परिहारः)<br>न ह्यनुष्ठेयस्य त्र्यंशस्य भावनाख्यस्यानुष्ठेयत्वात्तथात्वम्, किं तर्हि ? प्रमाणसमधिगतत्वात् । न च तद्विषयाया बुद्धेरनुष्ठेयविषयत्वात्तथार्थत्वम्, किं तर्हि ? वेदवाक्य- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ज्ञान यथार्थ वस्तुविषयक होता है। त्र्यंश (तीन अंशवाली) भावनासंज्ञक अनुष्ठेय कर्मकी, अनुष्ठेय होनेके कारण, यथार्थता नहीं है, तो फिर किस कारणसे है ? श्रुतिप्रमाणद्वारा ज्ञात होनेके कारण। इसी प्रकार परमात्मविषयक बुद्धिकी यथार्थता भी अनुष्ठेयवस्तुविषयक होनेसे नहीं है, तो फिर किस कारणसे है ? |


१. उन तीन अंशोंका स्वरूप यह है— (१) क्या भावना करे ? (२) किसके द्वारा भावना करे ? (३) किस प्रकार भावना करे ?

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