बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 105, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| जनितत्वादेव । वेदवाक्याधिगतस्य वस्तुनस्तथात्वे सत्यनुष्ठेयत्वविशिष्टं चेदनुतिष्ठति । नो चेदनुष्ठेयत्वविशिष्टं नानुतिष्ठति । | वेदवाक्यजनित होनेसे ही उसकी यथार्थता है । वेदवाक्यद्वारा ज्ञात वस्तुके यथार्थ सिद्ध होनेपर यदि वह अनुष्ठेयत्वविशिष्ट होती है तो पुरुष उसका अनुष्ठान करता है और यदि अनुष्ठेयत्वविशिष्ट नहीं होती तो उसका अनुष्ठान नहीं करता । |
| अननुष्ठेयत्वे वाक्यप्रमाणत्वानुपपत्तिरिति चेत् ।<br><br>(अननुष्ठेयत्वा-ज्ञानवाक्या-नामानर्थक्या-शङ्कनम्)<br><br>न ह्यनुष्ठेयेऽसति पदानां संहतिरूपपद्यते । अनुष्ठेयत्वे तु सति तादर्थ्येन पदानि संहन्यन्ते । तत्रानुष्ठेयनिष्ठं वाक्यं प्रमाणं भवति इदमनेनैवं कर्तव्यमिति । न त्विदमनेनैवमित्येवं प्रकाराणां पदशतानामपि वाक्यत्वमस्ति 'कुर्यात्क्रियेत कर्तव्यं भवेत्स्यादिति पञ्चमम्' इत्येवमादीनामन्यतमेऽसति । अतः परमात्मेश्वरादीनामवाक्यप्रमाणत्वम्, पदार्थत्वे च प्रमाणान्तरविषयत्वम् । अतोऽसदेतदिति चेत् ? | **पूर्व—**किंतु अनुष्ठेयत्व न होनेपर तो वह वाक्यप्रमाणका विषय ही नहीं हो सकता । अनुष्ठेय न होनेपर पदोंका संहत होना ही सम्भव नहीं है । अनुष्ठेयत्व होनेपर ही उसे प्रकाशित करनेके लिये पदोंका मेल होता है । 'इसे यह इस प्रकार करना चाहिये' इस प्रकार अनुष्ठेयपरक वाक्य ही प्रमाण होता है । 'कुर्यात्, क्रियेत, कर्तव्यम्, भवेत्, स्यात्' ये पाँच विधि-बोधक क्रियापद हैं। ऐसे क्रियापदोंमेंसे किसीके भी न होनेपर तो 'इसे यह इस प्रकार' ऐसे सैकड़ों पदोंके मिलनेपर भी उनमें वाक्यत्व नहीं आ सकता । अतः परमात्मा एवं ईश्वरादि वाक्यप्रमाणके विषय नहीं हो सकते । यदि वे पदार्थ हैं तो किसी अन्य प्रमाणके विषय होंगे । अतः [ वे शास्त्रप्रमाणजनित हैं ] यह मानना ठीक नहीं । |
| न, 'अस्ति मेरुर्वर्णचतुष्टयोपेतः' | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, |