भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 106
१००बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
(तस्य परिहारः)<br>इत्येवमाद्यननुष्ठेयेऽपिवाक्यदर्शनात् ।<br>न च 'मेरुर्वर्णचतुष्टयोपेतः' इत्येवमादिवाक्यश्रवणे मेर्वादावनुष्ठेयत्वबुद्धिरुत्पद्यते । तथा अस्तिपदसहितानां परमात्मेश्वरादिप्रतिपादकवाक्यपदानां विशेषणविशेष्यभावेन संहतिः केन वार्यते ।क्योंकि 'मेरु चार वर्णोंसे युक्त है' इत्यादिमें अनुष्ठेय न होनेपर भी वाक्य देखा जाता है। 'मेरु चार वर्णोंसे युक्त है' इत्यादि वाक्य सुननेसे मेरु आदिमें अनुष्ठेयत्वबुद्धि भी उत्पन्न नहीं होती। इसी प्रकार परमात्मा और ईश्वरका प्रतिपादन करनेवाले 'अस्ति' पदयुक्त वाक्योंके पदोंकी विशेष्यविशेषणभावसे होनेवाली संहतिको भी कौन रोक सकता है ?
मेर्वादिज्ञानवत्परमात्मज्ञाने प्रयोजनाभावादयुक्तमिति चेत् ?पूर्व०—किंतु मेरु आदिके ज्ञानके समान परमात्माके ज्ञानसे तो कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, इसलिये ऐसा मानना व्यर्थ है।
(ज्ञानवाक्यानां निष्प्रयोजनत्व-परिहारः)<br>न, "ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै० उ० २ । १ । १)<br>"भिद्यते हृदयग्रन्थिः" (मु० उ० २ । २ । ८) इति फलश्रवणात्, संसारबीजाविद्यादिदोषनिवृत्तिदर्शनाच्च । अनन्यशेषत्वाच्च तज्ज्ञान-सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि परमात्मज्ञानका तो "ब्रह्मवेत्ता परम पद प्राप्त कर लेता है" "उसकी हृदयग्रन्थि टूट जाती है" इत्यादि फल सुना गया है तथा उससे संसारके बीजभूत अविद्यादि दोषकी निवृत्ति भी होती देखी गयी है। परमात्माका ज्ञान किसी अन्य कर्मका शेष भी नहीं है; इसलिये [पर्णमयीत्वाधिकरणकी ] 'जुहू'के

१. क्योंकि जिस प्रकार 'जुहू' को अन्य कर्मका शेषत्व प्राप्त करानेवाला 'यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति' इत्यादि प्रमाण मिलता है, वैसा ब्रह्मज्ञानको 'यह किसी अनुष्ठानका अङ्ग है'—इस प्रकार अन्यशेषत्व प्राप्त करानेवाला कोई प्रमाण नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतिको अर्थवाद नहीं कहा जा सकता।