बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1047, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1047
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| नस्य स्वातन्त्र्याभावात्; "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन" (३।२।१३) इत्युक्तम्। एतस्य ह्यनर्थस्योपशमोपायविधानाय सर्वशाखोपनिषदः प्रवृत्ताः। न हि तद्विहितोपायानुसेवनं मुक्त्वा आत्यन्तिकोऽस्यानर्थस्योपशमोपायोऽस्ति; तस्मादत्रैवो पनिषद्विहितोपाये यत्नपरैर्भवितव्यमित्येष प्रकरणार्थः। | क्योंकि कर्मद्वारा ले जाये जाते हुए जीवकी स्वतन्त्रता नहीं रहती; इस विषयमें "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी" ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। इस अनर्थकी निवृत्तिका उपाय बतानेके लिये ही समस्त शाखाओंकी उपनिषदें प्रवृत्त हुई हैं। उनके विधान किये हुए उपायके निरन्तर सेवनके बिना इस अनर्थ को आत्यन्तिक निवृत्तिका कोई और उपाय नहीं है; अतः इस उपनिषद्विहित उपायके अनुष्ठानमें ही प्रयत्न करते रहना चाहिये—यही इस प्रकरणका तात्पर्य है। |
| शकटवत् सम्भृतसम्भार उत्सर्जन् यातीत्युक्तं किं पुनस्तस्य परलोकाय प्रवृत्तस्य पथ्यदनं शाकटिकसम्भारस्थानीयम्, गत्वा वा परलोकं यद् भुङ्क्ते? शरीराद्यारम्भकं च यत् तत् किम्? इत्युच्यते—तं परलोकाय गच्छन्तमात्मानं विद्याकर्मणी, विद्या च कर्म च विद्याकर्मणी विद्या सर्वप्रकारा विहिता प्रतिषिद्धा च, अविहिता | ऊपर यह कहा गया है कि गाड़ीके समान जिसने बोझा धारण किया हुआ है, वह जीव शब्द करता हुआ जाता है; किंतु गाड़ीवानके राहखर्चके समान परलोकके लिये जानेवाले इस जीवकी रास्तेकी भोजनसामग्री क्या है, जिसे यह परलोकमें जाकर खाता है? तथा जो उसके शरीरादिका आरम्भक है, वह भी क्या है? सो बतलाया जाता है—परलोकको जानेवाले उस आत्माके साथ विद्या और कर्म—सब प्रकारकी विहित और प्रतिषिद्ध तथा अविहित और |