बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1048, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| अप्रतिषिद्धा च, तथा कर्म विहितं प्रतिषिद्धं च अविहित-मप्रतिषिद्धं च, समन्वारभेते सम्यगन्वारभेते अन्वालभेते अनुगच्छतः। पूर्वप्रज्ञा च--पूर्वानुभूतविषया प्रज्ञा पूर्वप्रज्ञा अतीतकर्म फलानुभववासनेत्यर्थः। | अप्रतिषिद्ध विद्या ही यहाँ विद्या है एवं विहित और प्रतिषिद्ध तथा अविहित और अप्रतिषिद्ध कर्म ही कर्म हैं-ये विद्या और कर्म सम्यक् अन्वारम्भ अन्वालम्भन अर्थात् अनुसरण करते हैं। तथा पूर्वप्रज्ञा पूर्वानुभवसम्बन्धिनी प्रज्ञा अर्थात् अतीत कर्मफलानुभवकी वासना भी [ साथ जाता है ]। | | सा च वासना अपूर्वकर्मारम्भे कर्मविपाके चाङ्गं भवति; तेनासावप्यन्वारभते, न हि तया वासनया विना कर्म कर्तुं फलं चोपभोक्तुं शक्यते; न ह्यनभ्यस्ते विषये कौशलमिन्द्रियाणां भवति। पूर्वानुभववासनाप्रवृत्तानां त्विन्द्रियाणामिहाभ्यासमन्तरेण कौशलमुपपद्यते; दृश्यते च केषाञ्चित् कासुचित् क्रियासु चित्रकर्मादिलक्षणासु विनैवेहाभ्यासेन जन्मत एव कौशलं कासुचिदत्यन्तसौकर्ययुक्तास्वप्यकौशलं केषाञ्चित्। यथा विषयोपभोगेषु स्वभावत एव केषाञ्चित् कौशलाकौशले दृश्येते। तच्चैतत् सर्वं पूर्व- | वह वासना ही अपूर्व कर्मके आरम्भ और कर्मविपाकमें अङ्ग होती है; अतः यह भी उसके साथ जाती है; उस वासनाके बिना यह कर्म करने और उसका फल भोगनेमें समर्थ नहीं होता; क्योंकि जिस विषयका अभ्यास नहीं होता, उसमें इन्द्रियोंकी कुशलता भी नहीं होती। यहाँ पूर्वानुभवकी वासनासे प्रवृत्त हुई इन्द्रियोंकी बिना अभ्यासके कुशलता होनी सम्भव है; यह बात देखी ही जाती है कि किन्हीं पुरुषोंकी तो चित्रकलादिके समान क्रियाओंमें भी बिना अभ्यासके जन्मसे ही कुशलता होती है और किन्हीं-किन्हींकी अत्यन्त सुगम क्रियाओंमें भी कुशलता नहीं होती। जैसे विषयोपभोगमें भी किन्हींकी स्वभावतः ही कुशलता या अकुशलता देखी जाती है। सो यह सब |