बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1049, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०३५
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रज्ञोद्भावानुद्भवनिमित्तम्, तेन पूर्वप्रज्ञया विना कर्मणि वा फलोपभोगे वा न कस्यचित् प्रवृत्तिरुपपद्यते। <br><br> तस्मादेतत् त्रयं शाकटिकसम्भारस्थानीयं परलोकपथ्यदनं विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञाख्यम्। यस्माद् विद्याकर्मणी पूर्वप्रज्ञा च देहान्तरप्रतिपत्त्युपभोगसाधनम्, तस्माद् विद्याकर्मादि शुभमेव समाचरेत् यथेष्टदेहसंयोगोपभोगौ स्यातामिति प्रकरणार्थः ॥ २ ॥ | पूर्वप्रज्ञाके उद्बुद्ध और अनुद्बुद्ध होनेके कारण ही होती है। इसलिये पूर्वप्रज्ञाके बिना किसीकी भी कर्म या उसके फलोपभोगमें प्रवृत्ति होनी सम्भव नहीं है। <br><br> अतः गाड़ीवानके राहखर्चकी सामग्रीके समान ये विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा नामक तीन पदार्थ ही परलोकके मार्गकी भोजन-सामग्री हैं। चूँकि विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा—ये देहान्तरकी प्राप्ति और उपभोगके साधन हैं, इसलिये शुभ विद्या और कर्मादिका ही आचरण करे, जिससे कि अभीष्ट देहकी प्राप्ति और उपभोग हों—यही इस प्रकरणका तात्पर्य है ॥ २ ॥ |
| एवं विद्यादिसम्भारसम्भृतो देहान्तरं प्रतिपद्यमानः, मुक्त्वा पूर्वं देहं पक्षीव वृक्षान्तरं देहान्तरं प्रतिपद्यते। अथवा आतिवाहिकेन शरीरान्तरेण कर्मफलजन्मदेशं नीयते। <br><br> किञ्चात्रस्थस्यैव सर्वगतानां करणानां वृत्तिलाभो भवति। | इस प्रकार विद्यादिके भारसे लदा हुआ, देहान्तरको प्राप्त करनेवाला जीव पूर्वदेहको छोड़कर वृक्षसे दूसरे वृक्षको जानेवाले पक्षीके समान, अन्य देहको प्राप्त करता है अथवा एक दूसरे आतिवाहिक देहसे कर्मफलके उद्भवस्थान (देवलोकादि) को ले जाया जाता है। <br><br> शङ्का—क्या उसे यहाँ स्थित रहते हुए ही सर्वगत इन्द्रियोंकी वृत्ति प्राप्त |