बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1050, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| आहोस्विच्छरीरस्थस्य संकुचितानि करणानि मृतस्य भिन्नघटप्रदीपप्रकाशवत् सर्वतो व्याप्य पुनर्देहान्तरारम्भे संकोचमुपगच्छन्ति? किञ्च मनोमात्रं वैशेषिकसमय इव देहान्तरारम्भदेशं प्रति गच्छति? किं वा कल्पनान्तरमेव वेदान्तसमय इति। | हो जाती है? अथवा शरीरस्थ जीवकी संकुचित इन्द्रियाँ मरनेपर, फूटे हुए घड़ेके प्रकाशके समान सर्वत्र व्याप्त होकर, देहान्तरका आरम्भ होनेपर पुनः संकोचको प्राप्त हो जाती हैं? अथवा वैशेषिक सिद्धान्तवालोंके मतानुसार केवल मन ही देहान्तरके देशमें जाता है? किंवा वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार कल्पनान्तर ही देहान्तरकी प्राप्ति है? | | उच्यते—"त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः" (बृ० उ० १।५।१३) इति श्रुतेः—सर्वात्मकानि तावत् करणानि, सर्वात्मकप्राणसंश्रयाच्च; तेषामाध्यात्मिकाधिभौतिकपरिच्छेदः प्राणिकर्मज्ञानभावनानिमित्तः। अतस्तद्वशात् स्वभावतः सर्वगतानामनन्तानामपि प्राणानां कर्मज्ञानवासनानुरूपेणैव देहान्तरारम्भवशात् प्राणानां वृत्तिः संकुचति विकसति च। तथा चोक्तम्—"समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण" (बृ० उ० १। | समाधान-बतलाते हैं—"वे ये सभी समान और सभी अनन्त हैं" इस श्रुतिके अनुसार तथा सर्वात्मक प्राणके आश्रित होनेसे इन्द्रियाँ तो सर्वात्मक ही हैं; उनका आध्यात्मिक और आधिभौतिक परिच्छेद प्राणियोंके कर्म, ज्ञान और भावनाके कारण है। अतः उनके अधीन होनेके कारण, स्वभावतः सर्वगत और अनन्त होनेपर भी भोक्ता प्राणोंके कर्म, ज्ञान और वासनाके अनुसार ही देहान्तरके आरम्भवश प्राणोंकी वृत्तिका संकोच या विकास होता है। ऐसा ही कहा भी है "यह प्राण चींटीके प्रमाणका है, मच्छरके समान है, हाथीके बराबर है, इन तीनों लोकोंके समान है और इस सबके |