बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1051, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३७
| ३।२२) इति। तथा चेदं वचनमनुकूलम्—“स यो हैताननन्तानुपास्ते” (बृ० उ० १।५। १६) इत्यादि “तं यथा यथोपासते” इति च।<br><br>तत्र वासना पूर्वप्रज्ञाख्या विद्याकर्मतन्त्रा जलूकावत्संततैव स्वप्नकाल इव कर्मकृतं देहाद्देहान्तरमारभते हृदयस्थैव। पुनर्देहान्तरारम्भे देहान्तरं पूर्वाश्रयं विमुञ्चति—इत्येतस्मिन्नर्थे दृष्टान्त उपादीयते— | समान है”। इसी प्रकार “जो भी इन अनन्तोंकी उपासना करता है” तथा “उसकी जो जिस प्रकार उपासना करते हैं” इत्यादि वचन भी अनुकूल हो सकते हैं।<br><br>इनमें कर्म और ज्ञानके अधीन जो पूर्वप्रज्ञा नामकी वासना है, वह जोंकके समान सर्वत्र व्याप्त रहते हुए ही हृदयस्थित रहकर जैसे स्वप्नावस्थाके शरीरकी रचना करती है, उसी प्रकार इस देहसे भिन्न दूसरे कर्मजनित देहको रच लेती है। फिर देहान्तरका आरम्भ हो जानेपर अपने पूर्वाश्रित देहको त्याग देती है—इस विषयमें यह दृष्टान्त बतलाया जाता है— |
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देहान्तरगमनमें जोंकका दृष्टान्त
तद् यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेदꣳ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥ ३ ॥
वह दृष्टान्त—जिस प्रकार जोंक एक तृणके अन्तमें पहुँचकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको सकोड़ लेती है, इसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको मारकर—अविद्या (अचेतनावस्था) को प्राप्त कराकर दूसरे आधारका आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है ॥ ३ ॥
| तत्तत्र देहान्तरसंचार इदं निदर्शनम्—यथा येन प्रकारेण तृणजलायुका तृणजलूका तृण- | उस देहान्तरसंचारमें यह उदाहरण है—यथा जिस प्रकार तृण-जलूका (घासपर चलनेवाली जोंक) |
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