बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1052, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| स्यान्तमवसानं गत्वा प्राप्य अन्यं तृणान्तरमाक्रमम्, आक्रम्यत इत्याक्रमस्तमाक्रममाक्रम्याश्रित्य, आत्मानम् आत्मनः पूर्वावयवम् उपसंहरत्यन्त्यावयवस्थाने; एवमेव अयमात्मा यः प्रकृतः संसारीदं शरीरं पूर्वोपात्तं निहत्य स्वप्नं प्रतिपित्सुरिव पातयित्वा अविद्यां गमयित्वा अचेतनं कृत्वा स्वात्मोपसंहारेण, अन्यमाक्रमं तृणान्तरमिव तृणजलूका शरीरान्तरं गृहीत्वा प्रसारिता वास नया आत्मानमुपसंहरति, तत्रात्मभावमारभते; यथा स्वप्ने देहान्तरमारभते स्वप्नदेहान्तरस्थ इव शरीरारम्भदेश आरभ्यमाणे देहे जङ्गमे स्थावरे वा। | तृणके अन्त-अन्तिम भागपर पहुँचकर दूसरे तृणरूप आक्रमका—जो आक्रान्त किया जाय उसे आक्रम कहते हैं, उस आक्रम यानी आधारका आश्रय ले अपनेको अर्थात् अपने पूर्वावयवको पिछले अवयवके स्थानमें सकोड़ लेती है; इसी प्रकार यह संसारी आत्मा, जिसका यहाँ प्रकरण है, इस अपने पूर्वप्राप्त शरीरको मारकर—स्वप्नप्राप्तिकी इच्छावालेके समान गिराकर, इसे अविद्याको प्राप्त कराकर अर्थात् अपने आत्माके उपसंहारद्वारा अचेतन कर, तृणजलूकाके एक तृणसे दूसरे तृणपर जानेके समान दूसरे आक्रम यानी शरीरान्तरको अपनी फैली हुई वासनासे ग्रहणकर अपना उपसंहार कर लेता है, अर्थात् उसीमें आत्मभाव करने लगता है; जिस प्रकार यह स्वप्नमें देहान्तरका आरम्भ करता है उसी प्रकार स्वप्नदेहान्तरस्थ जीवके समान यह शरीरारम्भदेशमें अर्थात् आरम्भ किये हुए जङ्गम या स्थावर देहमें आत्मभाव कर लेता है! | | तत्र च कर्मवशात् करणानि लब्धवृत्तीनि संहन्यन्ते; बाह्यं च कुशमृत्तिकास्थानीयं शरीरमारभ्यते। तत्र च करणव्यूहमपेक्ष्य | वहीं कर्मवश इन्द्रियाँ भी वृत्तियुक्त होकर संगठित हो जाती हैं और कुश मृत्तिकास्थानीय बाह्य शरीरका भी आरम्भ हो जाता है। फिर उसीमें इन्द्रियव्यूहकी अपेक्षासे |