बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1053, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३९
| वागाद्यनुग्रहायाग्न्यादिदेवताः संश्रयन्ते । एष देहान्तरारम्भविधिः ॥ ३ ॥ | वागादि इन्द्रियोंका उपकार करनेके लिये अग्नि आदि देवता आश्रय ले लेते हैं। यही देहान्तरके आरम्भकी विधि है ॥ ३ ॥ |
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आत्माके देहान्तरनिर्माणमें सुवर्णकारका दृष्टान्त
| तत्र देहान्तरारम्भे नित्योपात्तमेवोपादानमुपमृद्योपमृद्य देहान्तरमारभते, आहोस्विदपूर्वमेव पुनः पुनरादत्त इति ? अत्रोच्यते दृष्टान्तः— | उस देहान्तरके आरम्भमें जीव नित्य ग्रहण किये हुए उपादानको ही बिगाड़ बिगाड़कर उसीसे देहान्तरका आरम्भ करता है अथवा पुनः पुनः नवीन उपादान ग्रहण करता है। इसमें दृष्टान्त बतलाया जाता है— |
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तद् यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदꣳ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यन्नवतरं कल्याणतरꣳ रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वान्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥
उसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सोनार सुवर्णका भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर (अधिक सुन्दर) रूपकी रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको नष्ट कर—अचेतनावस्थाको प्राप्तकर दूसरे पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्यभूतोंके नवीन और कल्याणतर रूपकी रचना करता है ॥ ४ ॥
| तत्तत्रैतस्मिन्नर्थे—यथा पेशस्कारी पेशः सुवर्णं तत् करोतीति पेशस्कारी सुवर्णकारः, पेशसः | उस इस विषयमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार पेशस्कारी-पेशस् सुवर्णको कहते हैं, उसे जो बनावे वह पेशस्कारी-सोनार, पेशस् अर्थात् |
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