भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1115, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1115

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११०१


| कथं पुनर्नित्यस्वाध्यायादिभिः कर्मभिरात्मानं विविदिषन्ति ? नैव हि तान्यात्मानं प्रकाशयन्ति, यथोपनिषदः । | शङ्का—किंतु नित्यस्वाध्यायादि कर्मोंसे आत्माको जाननेकी इच्छा किस प्रकार करते हैं ? क्योंकि उपनिषदोंके समान वे तो आत्माको प्रकाशित ही नहीं करते । | | नैष दोषः, कर्मणां विशुद्धिहेतुत्वात्; कर्मभिः संस्कृता हि विशुद्धात्मानः शक्नुवन्ति आत्मानमुपनिषत्प्रकाशितमप्रतिबन्धेन वेदितुम्; तथा ह्याथर्वणे—"विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः" (मु० उ० ३ । १ । ८) इति; स्मृतिश्च—"ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः" इत्यादि । | **समाधान—**यह दोष नहीं आ सकता; क्योंकि कर्म चित्तशुद्धिके कारण हैं। कर्मोंसे संस्कारयुक्त हुए विशुद्धचित्त पुरुष ही उपनिषत्प्रकाशित आत्माको बिना किसी रुकावटके जान सकते हैं। ऐसा ही "तब विशुद्धचित्त हुआ पुरुष ध्यान करके उस निष्कल आत्माको देखता है" इस आथर्वण श्रुतिसे भी सिद्ध होता है तथा "पापकर्मोंका क्षय हो जानेसे पुरुषोंको ज्ञान उत्पन्न होता है" ऐसी स्मृति भी है। | | कथं पुनर्नित्यानि कर्माणि संस्कारार्थानीत्यवगम्यते ? | **शङ्का—**किंतु नित्यकर्म चित्तशुद्धि करनेके लिये हैं—यह कैसे जाना जाता है ? | | "स ह वा आत्मयाजी यो वेदेदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियत इदम् मेऽनेनाङ्गमुपधीयते" इत्यादिश्रुतेः सर्वेषु च स्मृतिशास्त्रेषु कर्माणि संस्कारार्थान्येव आचक्षते "अष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः" इत्यादिषु । | समाधान—"वही आत्मयाजी है जो ऐसा जानता है कि इस कर्मसे मेरा यह अङ्ग संस्कारयुक्त होता है, इस कर्मसे मेरा यह अङ्ग योग्य होता है" इत्यादि श्रुतिसे यह जाना जाता है। "अड़तालीस संस्कार हैं" इत्यादि समस्त स्मृतिशास्त्रोंमें भी कर्मोंको चित्तशुद्धिके लिये ही बतलाया गया |