बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1116, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| गीतासु च—“यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥” (१८।५) “सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥” (४।३०) इति । यज्ञेनेति—द्रव्ययज्ञा ज्ञानयज्ञाश्च संस्कारार्थाः; संस्कृतस्य च विशुद्धसत्त्वस्य ज्ञानोत्पत्तिरप्रतिबन्धेन भविष्यति; अतो यज्ञेन विविदिषन्ति ।<br><br>दानेन—दानमपि पापक्षयहेतुत्वाद् धर्मवृद्धिहेतुत्वाच्च ।<br><br>तपसा, तप इत्यविशेषेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिप्राप्तौ विशेषणम्—अनाशकेनेति; कामानशनमनाशकम्, न तु भोजननिवृत्तिः; भोजननिवृत्तौ म्रियत एव, न आत्मवेदनम् ।<br><br>वेदानुवचनयज्ञदानतपःशब्देन सर्वमेव नित्यं कर्म उपलक्ष्यते; एवं काम्यवर्जितं नित्यं कर्मजातं | है। गीता में भी—"यज्ञ, दान और तप--ये बुद्धिमान् पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं" "यज्ञोंद्वारा जिनके पाप नष्ट हो गये हैं—ऐसे ये सभी लोग यज्ञवेत्ता हैं" ऐसा कहा है। 'यज्ञेन' इस पदसे द्रव्ययज्ञ और ज्ञानयज्ञ लेने चाहिये, ये दोनों ही संस्कारके लिये हैं; संस्कारयुक्त विशुद्धचित्त पुरुषको ही बिना किसी प्रतिबन्धके ज्ञानोत्पत्ति होगी। इसीसे यज्ञद्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं।<br><br>दानके द्वारा उसे जाननेकी इच्छा करते हैं, क्योंकि पापक्षयका कारण और धर्मवृद्धिका हेतु होनेके कारण दान भी ब्रह्मज्ञानका साधन है तथा तपके द्वारा, तपसे सामान्यतः कृच्छ्रचान्द्रायणादिकी प्राप्ति होती है, इसलिये 'अनाशकेन' यह उसका विशेषण दिया जाता है; मनमाना भोजन न करना ही अनाशक तप है, भोजनका सर्वथा त्याग कर देना नहीं। भोजनको सर्वथा त्याग देनेपर तो पुरुष मर ही जाता है, इससे आत्मज्ञान नहीं होता।<br><br>वेदानुवचन, यज्ञ, दान और तप--इन शब्दोंसे सारा ही नित्यकर्म उपलक्षित होता है। इस प्रकार काम्यकर्मरहित सम्पूर्ण नित्यकर्म |