भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1117, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1117
ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ११०३
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सर्वम् आत्मज्ञानोत्पत्तिद्वारेण मोक्षसाधनत्वं प्रतिपद्यते; एवं कर्मकाण्डेनास्यैकवाक्यतावगतिः।आत्मज्ञानकी उत्पत्तिके द्वारा मोक्षके साधन होते हैं। इस प्रकार कर्मकाण्डसे इस (ज्ञानकाण्ड) की एकवाक्यता ज्ञात होती है।
एवं यथोक्तेन न्यायेनैतमेव आत्मानं विदित्वा यथाप्रकाशितम्, मुनिर्भवति, मननान्मुनिः—योगी भवतीत्यर्थः; एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति, नान्यम्।इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे ऊपर मन्त्र एवं ब्राह्मणद्वारा बतलाये हुए इस आत्माको ही जानकर मुनि होता है। तात्पर्य यह है कि मनन करनेके कारण मुनि यानी योगी हो जाता है। इसीको जानकर मुनि होता है, किसी औरको नहीं।
ननु अन्यवेदनेऽपि मुनित्वं स्यात्; कथमवधार्यते—एतमेवेति ?शङ्का—किंतु मुनि तो अन्य वस्तुको जाननेपर भी हो सकता है, फिर इसीको जानकर—इस प्रकार निश्चय क्यों किया जाता है ?
बाढम् अन्यवेदनेऽपि मुनिर्भवेत्; किन्त्वन्यवेदने न मुनिरेव स्यात्, किं तर्हि ? कर्म्यपि भवेत् सः; एतं त्वौपनिषदं पुरुषं विदित्वा मुनिरेव स्यात्; न तु कर्मी; अतोऽसाधारणं मुनित्वं विवक्षितमस्येत्यवधारयति—एतमेवेति। एतस्मिन् हि विदिते, केन कं पश्येदित्येवं क्रियासम्भवान्मननमेव स्यात्।समाधान—ठीक है, दूसरेको जाननेपर भी मुनि हो सकता है, किंतु दूसरेको जाननेपर केवल मुनि ही नहीं होता, तो फिर क्या होता है ? वह कर्मी भी होता है। किंतु इस औपनिषद पुरुषको जाननेपर तो मुनि ही होता है, कर्मी नहीं होता। अतः इसका असाधारण मुनित्व बतलाना अभीष्ट है, इसीसे 'एतमेव' (इसीको) इस प्रकार श्रुति निश्चय करती है; क्योंकि इसे जान लेनेपर 'किसके द्वारा किसे देखे ?' इस श्रुतिके अनुसार क्रिया असम्भव हो जानेसे फिर मनन ही होगा।