बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1121, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११०७ |
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| ब्रह्मणोऽपि सर्वमध्यान्तर्भावात्; "यत्र नान्यत्पश्यति" (छा० उ० ७ । २४) इति च; पूर्वापरबाह्यान्तरदर्शनप्रतिषेधाच्च "अपूूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्" (बृ० उ० २ । ५ । १९) इति; "तत्केन कं पश्येत्... विजानीयात्" (बृ० उ० २ । ४ । १४) इति च; तस्मान्न आत्मदर्शनव्यतिरेकेण अन्यद् व्युत्थानकारणमपेक्षते । | अपरब्रह्मका भी सर्वके भीतर ही अन्तर्भाव है। "जहाँ अन्यको नहीं देखता" ऐसा भी कहा ही है। तथा "ब्रह्म अपूर्व, अनपर, अनन्तर और अबाह्य है" इस प्रकार ब्रह्ममें पूर्व, अपर, बाह्य एवं अन्तर दृष्टियोंका भी प्रतिषेध किया ही है और "उस समय किसके द्वारा किसे जाने?" ऐसा भी कहा ही है। अतः आत्मदर्शनके सिवा व्युत्थानके किसी अन्य कारणकी अपेक्षा नहीं है। | | कः पुनस्तेषामभिप्रायः ? | तो फिर [ व्युत्थान करनेमें ] उनका क्या अभिप्राय होता है? | | **इत्युच्यते—**किं प्रयोजनं फलं साध्यं करिष्यामः प्रजया साधनेन; प्रजा हि बाह्यलोकसाधनं निर्ज्ञाता; स च बाह्यलोको नास्त्यस्माकमात्मव्यतिरिक्तः; सर्वं हि अस्माकमात्मभूतमेव, सर्वस्य च वयमात्मभूताः । आत्मा च नः आत्मत्वादेव न केनचित् साधनेनोत्पाद्य आप्यो विकार्यः संस्कार्यो वा । | सो बतलाया जाता है। हम प्रजारूप साधनसे किस प्रयोजन—फल अर्थात् साध्यका सम्पादन करेंगे? प्रजा तो बाह्यलोकका साधन समझी गयी है और वह बाह्यलोक हमारे लिये आत्मासे भिन्न नहीं है; हमारे लिये तो सब आत्मस्वरूप ही है और हम भी सबके आत्मस्वरूप ही हैं तथा हमारा आत्मा भी आत्मा होनेके कारण ही किसी साधनसे उत्पाद्य, आप्य, विकार्य अथवा संस्कार्य नहीं है। |