भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1122, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1122
११०८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| यदप्यात्मयाजिनः संस्कारार्थं कर्मेति, तदपि कार्यकारणात्मदर्शनविषयमेव, इदं मे अनेन अङ्गं संस्क्रियते—इत्यङ्गाङ्गित्वादिश्रवणात्; न हि विज्ञानघनैकरसनैरन्तर्यदर्शिनोऽङ्गाङ्गिसंस्कारोपधानदर्शनं संभवति । तस्मान्न किञ्चित् प्रजादिसाधनैः करिष्यामः; अविदुषां हि तत् प्रजादिसाधनैः कर्तव्यं फलम्; न हि मृगतृष्णिकायामुदकपानाय तदुदकदर्शी प्रवृत्त इति तत्र ऊषरमात्रमुदकाभावं पश्यतोऽपि प्रवृत्तिर्युक्ता; एवमस्माकमपि परमार्थात्मलोकदर्शिनां प्रजादिसाधनसाध्ये मृगतृष्णिकादिसमेऽविद्वद्दर्शनविषये न प्रवृत्तिर्युक्तेत्यभिप्रायः । | और ऐसा जो कहा है कि कर्म आत्मयाजीके संस्कारके लिये है, वह भी देह और इन्द्रियोंमें आत्मबुद्धि करनेको लक्ष्य करके ही है; क्योंकि इसके द्वारा मेरे इस अङ्गका संस्कार होता है—इस प्रकार श्रुतिसे उसमें अङ्गाङ्गित्व-भाव ज्ञात होता है । जो निरन्तर एक विज्ञानघनरसस्वरूपको ही देखता है, उसके लिये अङ्गाङ्गिसंस्कारोंका अवलम्ब देखना सम्भव नहीं है, इसलिये प्रजादि साधनोंसे हम कोई भी प्रयोजन नहीं सिद्ध करेंगे । जो अविद्वान् हैं, उन्हें ही उन प्रजादि साधनोंसे फल प्राप्त करना है । मृगतृष्णामें जल देखनेवाला जलपानके लिये उसकी ओर जाता है, इसलिये उसे ऊसरमात्र और उसमें जलका अभाव देखनेवालेकी भी प्रवृत्ति होनी ही चाहिये—ऐसी बात नहीं है । इसलिये जो अज्ञानियोंकी दृष्टिका विषय और मृगतृष्णादिके समान है, उस प्रजादिसाधनसे साध्य फलमें हम परमार्थ आत्मलोकदर्शियोंकी भी प्रवृत्ति होनी उचित नहीं है—ऐसा इसका अभिप्राय है । |