बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1123, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ११०९
| तदेतदुच्यते—येषामस्माकं परमार्थदर्शिनां नः, अयमात्मा अशनायादिविनिर्मुक्तः साध्वसाधुभ्यामविकार्योऽयं लोकः फलमभिप्रेतम्; न चास्यात्मनः साध्यसाधनादिसर्वसंसारधर्मविनिर्मुक्तस्य साधनं किञ्चिद्देषितव्यम्; साध्यस्य हि साधनान्वेषणा क्रियते; असाध्यस्य साधनान्वेषणायां हि, जलबुद्ध्या स्थल इव तरणं कृतं स्यात्, खे वा शाकुनपदान्वेषणम् । तस्मादेतमात्मानं विदित्वा प्रव्रजेयुरेव ब्राह्मणाः, न कर्म आरभेरन्नित्यर्थः; यस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा एवं विद्वांसः प्रजामकामयमानाः । <br><br> त एवं साध्यसाधनसंव्यवहारं निन्दन्तः 'अविद्वद्विषयोऽयम्' इति कृत्वा, किं कृतवन्तः ? इत्युच्यते—'ते ह स्म किल पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति' इत्यादि व्याख्यातम् । | वही बात यहां बतलायी जाती है—जिन हम परमार्थदर्शियोंको यह क्षुधादिधर्मसे रहित तथा शुभाशुभ कर्मसे अविकार्य आत्मलोक-रूप फल अभिप्रेत है; साध्यसाधनादि सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित इस आत्माको किसी भी साधनकी अपेक्षा नहीं है; जो साध्य होता है, उसीके साधनकी खोज की जाती है, असाध्यके साधनकी खोज करनेमें तो मानो जलबुद्धिसे स्थलमें तैरना है अथवा आकाशमें पक्षीके पदोंकी खोज करना है । अतः इस आत्माको जानकर ब्राह्मणलोग सब कुछ त्याग कर चले जायँ ( संन्यासी हो जायँ ), किसी कर्मका आरम्भ न करें—ऐसा इसका तात्पर्य है; क्योंकि इस प्रकार जाननेवाले पूर्ववर्ती ब्राह्मण भी प्रजाकी इच्छा करनेवाले नहीं थे । <br><br> वे इस प्रकार साध्यसाधनरूप व्यवहारकी निन्दा करते हुए 'यह सब अज्ञानियोंका विषय है' ऐसा सोचकर, क्या करते थे ? सो बतलाया जाता है—'वे निश्चय ही पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे पृथक् होकर भिक्षाचर्या करते थे, इस प्रकार इसकी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है । |