भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1124, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1124
१११०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
तस्मादात्मानं लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति प्रव्रजेयुः—इत्येष विधिरर्थवादेन संगच्छते; न हि सार्थवादस्य अस्य लोकस्तुत्याभिमुख्यमुपपद्यते; प्रव्रजन्तीत्यस्यार्थवादरूपो हि 'एतद्ध स्म' इत्यादिरुत्तरो ग्रन्थः। अर्थवादश्चेत्, नार्थवादान्तरमपेक्षेत; अपेक्षते तु 'एतद्ध स्म' इत्याद्यर्थवादं 'प्रव्रजन्ति' इत्येतत्।इसलिये आत्मलोककी इच्छा करनेवाले प्रव्रजन करें—संन्यासी हो जायें—इस प्रकार यह विधि अर्थवादसे संगत होती है। इस अर्थवादसहित विधिवचनका आत्मलोककी स्तुतिके लिये होना सम्भव नहीं है; 'प्रव्रजन्ति' इस विधि-वचनका अर्थवादरूप 'एतद्ध स्म' इत्यादि आगेका ग्रन्थ है। यदि 'प्रव्रजन्ति' यह वचन भी अर्थवाद ही होता तो इसे दूसरे अर्थवादकी अपेक्षा नहीं हो सकती थी। किंतु 'प्रव्रजन्ति' इस ग्रन्थको 'एतद्ध स्म' इत्यादि अर्थवादकी अपेक्षा है ही।
यस्मात् पूर्वे विद्वांसः प्रजादिकर्मभ्यो निवृत्ताः प्रव्रजितवन्त एव, तस्मादधुनातना अपि प्रव्रजन्ति प्रव्रजेयुः—इत्येवं संबध्यमानं न लोकस्तुत्यभिमुखं भवितुमर्हति; विज्ञानसमानकर्तृकत्वोपदेशादित्यादिना अवोचाम।क्योंकि प्रजादि कर्मोंसे निवृत्त हुए पूर्ववर्ती विद्वान् प्रव्रजित हुए ही थे, इसलिये आधुनिक ब्रह्मवेत्ता भी प्रव्रजन्ति अर्थात् प्रव्रजन (संन्यास) करें, इस प्रकार सम्बन्ध रखनेवाला वाक्य आत्मलोककी स्तुतिके लिये होना सम्भव नहीं है, क्योंकि विज्ञान और व्युत्थानका एक ही कर्ता है—ऐसा श्रुतिका उपदेश है—इत्यादि कथनसे हम यह बात पहले कह चुके हैं।
वेदानुवचनादिसहपाठाच्च, यथात्मवेदनसाधनत्वेन विहितानां वेदानुवचनादीनां यथार्थत्वमेव, नार्थवादत्वम्, तथा तैरेववेदानुवचनादिके साथ इसका पाठ होनेसे भी यह स्तुत्यर्थक नहीं हो सकता; जिस प्रकार आत्मज्ञानके साधनरूपसे विहित वेदानुवचनादि यथार्थ हैं—अर्थवाद नहीं हैं, उसी