बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1132, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १११८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है—यह ब्रह्मवेत्ताकी नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो बढ़ती है और न घटती ही है। उस महिमाके ही स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये, उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता। अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है, सभीको आत्मा देखता है। उसे [पुण्य-पापरूप] पापकी प्राप्ति नहीं होती, यह सम्पूर्ण पापोंको पार कर जाता है। इसे पाप ताप नहीं पहुँचाता, यह सारे पापोंको संतप्त करता है। यह पापरहित, निष्काम, निःसंशय ब्राह्मण हो जाता है। हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है, तुम इसे पहुँचा दिये गये हो—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। [तब जनकने कहा—] 'वह मैं श्रीमान्को विदेह देश देता हूँ, साथ ही आपकी दासता (सेवा) करनेके लिये अपने-आपको भी समर्पण करता हूँ' ॥ २३ ॥
| तदेतद् वस्तु ब्राह्मणेनोक्तमृचा मन्त्रेण अभ्युक्तं प्रकाशितम्। एष नेति नेत्यादिलक्षणो नित्यो महिमा, अन्ये तु महिमानः कर्मकृता इत्यनित्याः; अयं तु तद्विलक्षणो महिमा स्वाभाविकत्वान्नित्यो ब्रह्मविदो ब्राह्मणस्य त्यक्तसर्वैषणस्य। <br><br> कुतोऽस्य नित्यत्वमिति हेतुमाह—कर्मणा न वर्धते शुभलक्षणेन कृतेन वृद्धिलक्षणां विक्रियां न प्राप्नोति; अशुभेन कर्मणा नो | ब्राह्मणके द्वारा कही गयी यह बात ऋचा अर्थात् मन्त्रद्वारा भी कही—प्रकाशित की गयी है। यह 'नेति-नेति' इत्यादि श्रुतिके द्वारा लक्षित आत्मा नित्य महिमा है; दूसरी जो महिमाएँ हैं वे तो कर्मद्वारा सम्पन्न हुई हैं इसलिये अनित्य हैं; किंतु ब्राह्मण अर्थात् सम्पूर्ण एषणाओंका त्याग करनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी यह उनसे विलक्षण महिमा स्वाभाविक होनेके कारण नित्य है। <br><br> इसकी नित्यता क्यों है—इसमें श्रुति हेतु बतलाती है—यह कर्मसे नहीं बढ़ती अर्थात् किये हुए शुभरूप कर्मसे यह वृद्धिरूप विकारको प्राप्त नहीं होती। तथा अशुभ कर्मसे |