बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1133, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १११९
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| कनीयान् नाप्यपचयलक्षणां विक्रियां प्राप्नोति। उपचयापचयहेतुभूता एव हि सर्वा विक्रिया इति एताभ्यां प्रतिषिध्यन्ते। अतोऽविक्रियात्वान्नित्य एष महिमा। तस्मात् तस्यैव महिम्नः स्याद् भवेत्, पदवित्—पदस्य वेत्ता, पद्यते गम्यते ज्ञायत इति महिम्नः स्वरूपमेव पदम्, तस्य पदस्य वेदिता। | कनीयान्—क्षयरूप विकारको प्राप्त नहीं होती। समस्त विकार वृद्धि या क्षयके ही हेतुभूत हैं, अतः इन दो विकारोंके प्रतिषेधद्वारा उन सभीका प्रतिषेध कर दिया जाता है। इसलिये अविक्रिय होनेके कारण यह नित्य महिमा है। अतः उस महिमाका ही पदवित्--स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये। ['पद्यते इति पदम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार] जिसकी प्रतिपत्ति—अवगम अर्थात् ज्ञान होता है, वह पद है; अतः यहाँ स्वरूप ही पद है, उस पदका वेत्ता (जाननेवाला) 'पदवित्' कहलाता है। |
| किं तत्पदवेदनेन स्यादित्युच्यते—तं विदित्वा महिमानम्, न लिप्यते न सम्बध्यते कर्मणा पापकेन धर्माधर्मलक्षणेन, उभयमपि पापकमेव विदुषः। | उस पदको जाननेसे क्या होगा, सो बतलाया जाता हे—उस महिमाको जानकर पुरुष पाप—धर्माधर्मरूप कर्मसे लिप्त—सम्बद्ध नहीं होता। ज्ञानीके लिये तो [पाप-पुण्य] दोनों पापके तुल्य ही हैं। |
| यस्मादेवमकर्मसम्बन्धी एष ब्राह्मणस्य महिमा नेति नेत्यादिलक्षणः, तस्माद् एवंवित् शान्तः—बाह्येन्द्रियव्यापारत उपशान्तः, तथा दान्तः—अन्तःकरणतृष्णातो निवृत्तः, उपरतः सर्वैषणाविनि- | क्योंकि इस प्रकार यह 'नेति नेति' इत्यादि लक्षणवाली ब्राह्मणकी महिमा कर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है, इसलिये इस प्रकार जाननेवाला शान्त—बाह्य-इन्द्रिय-व्यापारसे उपशान्त, दान्त—अन्तःकरणकी तृष्णासे निवृत्त, उपरत—सम्पूर्ण |