भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 1135

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२१

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
इष्टफलप्रत्यवायोत्पादनाभ्याम्; सर्वं पाप्मानमयं तपति ब्रह्मवित् सर्वात्मदर्शनवह्निना भस्मीकरोति ।इष्टफलप्रदान और प्रत्यवायोत्पादनके द्वारा ताप नहीं पहुँचाता और यह ब्रह्मवित् सम्पूर्ण पापको तप्त करता यानी सर्वात्मदर्शनरूप अग्निसे भस्म कर देता है ।
स एष एवंविद् विपापो विगतधर्माधर्मः, विरजो विगतरजः, रजः कामः, विगतकामः, अविचिकित्सः—छिन्नसंशयः, अहमस्मि सर्वात्मा परं ब्रह्मेति निश्चितमतिः, ब्राह्मणो भवति ।वह यह इस प्रकार जाननेवाला विपाप—धर्माधर्महीन, विरज—विगतरज, 'रज' कामको कहते हैं, अतः निष्काम, अविचिकित्स—संशयहीन और 'मैं सर्वात्मा परब्रह्म हूँ' इस प्रकार जिसका निश्चय है वह ब्राह्मण हो जाता है ।
अयं त्वेवंभूत एतस्यामवस्थायां मुख्यो ब्राह्मणः, प्रागेतस्माद् ब्रह्मस्वरूपावस्थानाद् गौणमस्य ब्राह्मण्यम् । एष ब्रह्मलोकः—ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोको मुख्यो निरुपचरितः सर्वात्मभावलक्षणः, हे सम्राट् ! एनं ब्रह्मलोकं परिप्रापितोऽसि अभयं नेति नेत्यादिलक्षणम्—इति होवाच याज्ञवल्क्यः ।इस अवस्था में ऐसी स्थितिको प्राप्त हुआ यह ब्रह्मवेत्ता ही मुख्य ब्राह्मण है। इस ब्रह्मस्वरूपमें स्थिति होनेसे पूर्व तो इसका ब्राह्मणत्व गौण ही है [मुख्य नहीं]। यह ब्रह्मलोक है—ब्रह्म ही लोक है अर्थात् मुख्य (प्रधान) एवं उपचाररहित सर्वात्मभावरूप ब्रह्मलोक यही है। हे सम्राट् ! इस 'नेति नेति' इत्यादिरूपसे लक्षित अभय ब्रह्मलोकको तुम्हें पहुँचा दिया—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ।
एवं ब्रह्मभूतो जनको याज्ञवल्क्येन ब्रह्मभावमापादितः प्रत्याह—सोऽहं त्वया ब्रह्मभाव-इस प्रकार याज्ञवल्क्यद्वारा ब्रह्मभावको प्राप्त कराये हुए ब्रह्मभूत जनकने उत्तर दिया, आपके द्वारा

बृ० उ० ७१—