बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1136, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें११२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| मापादितः सन् भगवते तुभ्यं विदेहान् देशान् मम राज्यं समस्तं ददामि, मां च सह विदेहँर्दास्याय दासकर्मणे—ददामीति चशब्दात् सम्बध्यते ।<br><br>परिसमापिता ब्रह्मविद्या सह संन्यासेन साङ्गा सेतिकर्त्तव्यताका; परिसमाप्तः परमपुरुषार्थः, एतावत् पुरुषेण कर्त्तव्यम्, एषा निष्ठा, एषा परा गतिः, एतन्निःश्रेयसम्, एतत् प्राप्य कृतकृत्यो ब्राह्मणो भवति, एतत् सर्व्वेदानुशासनमिति ॥ २३ ॥ | ब्रह्मभावको प्राप्त कराया हुआ मैं आप श्रीमान्को विदेहदेश अर्थात् अपना सारा राज्य देता हूँ तथा विदेहदेशके साथ अपने-आपको भी दास्य—दासकर्मके लिये देता हूँ—इस प्रकार 'च' शब्दसे 'ददामि' (देता हूँ) इस क्रियाका सम्बन्ध लगाया जाता है ।<br><br>संन्यास, अङ्ग और इतिकर्त्तव्यताके सहित ब्रह्मविद्याकी सर्वथा समाप्ति हो गयी। परम पुरुषार्थका पर्यवसान हो गया। पुरुषको इतना ही कर्त्तव्य है, यही निष्ठा है, यही परा गति है और यही निःश्रेयस है। इसे पाकर ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है और यही सम्पूर्ण वेदका अनुशासन है ॥ २३ ॥ |
आत्मा अन्नाद और वसुदान है—इस प्रकारकी उपासनाका फल
| योऽयं जनकयाज्ञवल्क्याख्यायिकायां व्याख्यात आत्मा— | इस जनक-याज्ञवल्क्य-आख्यायिकामें जिस आत्माकी व्याख्या की गयी है— |
स वा एष महानज आत्मान्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २४ ॥
वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला और कर्मफल देनेवाला है। जो ऐसा जानता है, उसे सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्राप्त होता है ॥ २४ ॥