बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1137, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११२३
| स वै एष महान् अज आत्मा अन्नादः सर्वभूतस्थः सर्वान्नानामत्ता, वसुदानः—वसु धनं सर्वप्राणिकर्मफलम्, तस्य दाता, प्राणिनां यथाकर्म फलेन योजयितेत्यर्थः; तमेतमजमन्नादं वसुदानमात्मानमन्नादवसुदानगुणाभ्यां युक्तं यो वेद, स सर्वभूतेष्वात्मभूतः—अन्नमत्ति, विन्दते च वसु सर्वं कर्मफलजातं लभते सर्वात्मत्वादेव, य एवं यथोक्तं वेद । | वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्नाद—सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित रहकर समस्त अन्नोंका भोक्ता, वसुदान—वसु—धन अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियोंका कर्मफल उसे देनेवाला है; अर्थात् प्राणियोंको उनके कर्मानुसार फलसे संयुक्त करनेवाला है। उस इस अजन्मा, अन्नाद और वसुदान आत्माको जो अन्नाद और वसुदान गुणोंसे युक्त जानता है, वह समस्त भूतोंमें आत्मभूत हुआ अन्न भक्षण करता है; तथा जो ऐसा अर्थात् उपर्युक्त विषयको जानता है, वह सर्वात्मा होनेके कारण ही वसु यानी सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्राप्त करता है। |
| अथवा दृष्टफलार्थिभिरप्येवंगुण उपास्यः; तेन अन्नादो वसोश्च लब्धा, दृष्टेनैव फलेन अन्नात्तृत्वेन गोऽश्वादिना चास्य योगो भवतीत्यर्थः ॥ २४ ॥ | अथवा जिन्हें [अन्न और धनरूप] दृष्टफलकी इच्छा है, उनको भी ऐसे गुणोंवाले ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिये। इससे वह अन्नाद और धन प्राप्त करनेवाला होता है, अर्थात् प्रत्यक्ष प्राप्त होनेवाले ही अन्नादत्व और गौ, घोड़े आदि फलसे उसका योग होता है ॥ २४ ॥ |
ब्रह्मके स्वरूप और ब्रह्मज्ञकी स्थितिका वर्णन
| इदानीं समस्तस्यैवारण्यकस्य योऽर्थ उक्तः, स समुच्चित्य अस्यां कण्डिकायां निर्दिश्यते, एतावान् समस्तारण्यकार्थ इति— | अब इस सारे ही आरण्यकमें जो बात कही गयी है, वह संगृहीत करके इस कण्डिकामें बतलायी जाती है कि सारे आरण्यकका इतना ही तात्पर्य है— |