भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1138, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1138
११२४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयँ हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥ २५ ॥

वही यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर, अमृत एवं अभय ब्रह्म है। अभय ही ब्रह्म है, जो ऐसा जानता है वह अभय ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २५ ॥

| स वा एष महानज आत्मा अजरो न जीर्यत इति, न विपरिणमत इत्यर्थः, अमरः—यस्माच्च अजरः, तस्माद् अमरः, न म्रियत इत्यमरः; यो हि जायते जीर्यते च, स विनश्यति म्रियते वा; अयं तु अजत्वाद् अजरत्वाच्च अविनाशी यतः, अत एव अमृतः। यस्माद् जनिप्रभृतिभिस्त्रिभिर्भावविकारैर्वर्जितः तस्माद् इतरैरपि भावविकारैस्त्रिभिस्तत्कृतैश्च कामकर्ममोहादिभिर्मृत्युरूपैर्वर्जित इत्येतत् । <br><br> अभयोऽत एव; यस्माच्चैवं पूर्वोक्तविशेषणः, तस्माद् भयवर्जितः, भयं च हि नाम अविद्याकार्यम्, तत्कार्यप्रतिषेधेन भावविकारप्रतिषेधेन चाविद्यायाः प्रतिषेधः सिद्धो वेदितव्यः। अभय आत्मा | वही यह महान् अजन्मा आत्मा जीर्ण नहीं होता, इसलिये अजर है अर्थात् इसका विपरिणाम नहीं होता। 'अमरः'—क्योंकि अजर है, इसलिये अमर है, जो नहीं मरता उसे अमर कहते हैं। जो उत्पन्न होता अथवा जीर्ण होता है, वही विनष्ट होता अथवा मरता है। चूँकि यह अज और अजर होनेके कारण अविनाशी है, इसीलिये अमृत है। क्योंकि यह जन्मादि तीन भावविकारोंसे रहित है, इसलिये अन्य तीन भावविकारोंसे तथा उनसे होनेवाले मृत्युरूप काम, कर्म और मोहादिसे भी रहित है—ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> इसीसे यह अभय भी है। इस प्रकार चूँकि यह पूर्वोक्त विशेषणोंवाला है, इसलिये भयशून्य है; भय तो अविद्याका ही कार्य है, अविद्याके कार्य और भावविकारोंके प्रतिषेधसे अविद्याका प्रतिषेध भी सिद्ध हुआ समझना चाहिये। इस |

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