बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1176, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1176
पञ्चम अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
पूर्णब्रह्म और उससे उत्पन्न होनेवाला पूर्ण कार्य
| पूर्णमद इत्यादि खिलकाण्डमारभ्यते । अध्यायचतुष्टयेन यदेव 'साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरो निरुपाधिकोऽशनायाद्यतीतो नेति नेती'ति व्यपदेश्यो निर्धारितः यद्विज्ञानं केवलममृतत्वसाधनम्, अधुना तस्यैवात्मनः सोपाधिकस्य शब्दार्थादिव्यवहारविषयापन्नस्य पुरस्तादनुक्तान्युपासनानि कर्मभिरविरुद्धानि प्रकृष्टाभ्युदयसाधनानि क्रममुक्तिभाञ्जि च तानि वक्तव्यानि इति परः सन्दर्भः, सर्वोपासनशेषत्वेनोङ्कारो दमं दानं दयामित्येतानि च विधित्सितानि । | अब 'पूर्णमदः' इत्यादि ^१खिल-काण्ड आरम्भ किया जाता है। चार अध्यायोंके द्वारा जिस साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म तथा जिस सर्वान्तर, निरुपाधिक, क्षुधादिसे रहित और 'नेति-नेति' इस प्रकार संकेत किये जाने योग्य आत्माका निश्चय किया गया है तथा जिसका भलीभाँति ज्ञान हो जाना ही एकमात्र अमृतत्वका साधन है, शब्दार्थादि व्यवहारकी विषयताको प्राप्त हुए उसी सोपाधिक आत्माकी उन उपासनाओंका, जिनका कि पहले उल्लेख नहीं हुआ और जो कर्मसे अविरुद्ध, परम उत्तम अभ्युदयकी साधनभूत एवं क्रममुक्तिकी प्राप्ति करानेवाली हैं, अब वर्णन करना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ है; सम्पूर्ण उपासनाओंके अङ्गरूपसे ओंकार, दम, दान और दया—इनका विधान करना अभीष्ट है। |
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१. पूर्वकथित विषयसे अवशिष्ट विषयको 'खिल' कहते हैं। अतः खिल-काण्डका अर्थ 'परिशिष्ट प्रकरण' समझना चाहिये।