बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1177, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११६३
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ १ ॥
वह (परब्रह्म) पूर्ण है और वह (सोपाधिक ब्रह्म भी) पूर्ण है। यह (कार्यात्मक) पूर्ण (कारणात्मक) पूर्णसे ही उत्पन्न होता है। इस पूर्णका पूर्ण (अविद्याकृत अन्यत्वाभास) निकाल लेनेपर पूर्ण ही बच रहता है ॥ १ ॥
| भाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| पूर्णमदः पूर्णं न कुतश्चिद् व्यावृत्तं व्यापीत्येतत् । निष्ठा च कर्तरि द्रष्टव्या । अद इति परोक्षाभिधायि सर्वनाम, तत् परं ब्रह्मेत्यर्थः । तत् सम्पूर्णमाकाशवद् व्यापि निरन्तरं निरुपाधिकं च तदेवेदं सोपाधिकं नामरूपस्थं व्यवहारापन्नं पूर्णं स्वेन रूपेण परमात्मना व्याप्येव नोपाधिपरिच्छिन्नेन विशेषात्मना । | ‘पूर्णमदः’—पूर्णम्-जो कहींसे भी व्यावृत्त नहीं है, यानी व्यापक है। पूर्ण शब्दमें जो निष्ठासंज्ञक ‘क्त’ प्रत्यय हुआ है, उसे कर्ता अर्थमें समझना चाहिये। ‘अदः’ यह पद परोक्ष अर्थको बतलानेवाला सर्वनाम है, इसका अर्थ है वह—परब्रह्म। वह सम्पूर्ण है, यानी आकाशके समान व्यापक, अन्तररहित और उपाधिशून्य है। वही यह नाम-रूपमें स्थित व्यवहारदशाको प्राप्त सोपाधिकरूप भी पूर्ण है अर्थात् अपने परमात्मस्वरूपसे व्यापक ही है—उपाधिपरिच्छिन्न (सीमित) विशेषरूपसे व्यापक नहीं है। |
| तदिदं विशेषापन्नं कार्यात्मकं ब्रह्म पूर्णात् कारणात्मन उदच्यत उद्रिच्यत उद्गच्छतीत्येतत् । यद्यपि कार्यात्मनोद्रिच्यते तथापि यत् स्वरूपं पूर्णत्वं परमात्मभावं तन्न जहाति पूर्णमेवोद्रिच्यते । | वह यह विशेषभावको प्राप्त हुआ कार्यात्मक ब्रह्म पूर्णसे कारणात्मक ब्रह्मसे ‘उदच्यते’—उद्रिक्त होता अर्थात् उद्गत (प्रकट) होता है। यद्यपि यह कार्यरूपसे प्रकट होता है तो भी इसका स्वरूपभूत जो पूर्णत्व अर्थात् परमात्मभाव है, उसे नहीं छोड़ता अर्थात् पूर्ण ही प्रकट होता है। |