बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1212, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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प्रतिष्ठित हैं। आदित्य रश्मियोंके द्वारा चाक्षुष पुरुषमें प्रतिष्ठित है और चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा उसमें प्रतिष्ठित है। जिस समय यह (चाक्षुष पुरुष) उत्क्रमण करने लगता है, उस समय यह इस मण्डलको शुद्ध ही देखता है। फिर ये रश्मियां इसके पास नहीं आतीं ॥ २ ॥
| तद् यत्, किं तत् ? सत्यं ब्रह्म प्रथमजम्, किम् ? असौ सः। कोऽसौ ? आदित्यः, कः पुनरसावादित्यः ? य एषः, क एषः ? य एतस्मिन्नादित्यमण्डले पुरुषोऽभिमानी सोऽसौ सत्यं ब्रह्म; यश्चायमध्यात्मं योऽयं दक्षिणेऽक्षन्नक्षणि पुरुषः; चशब्दात् स च सत्यं ब्रह्मेति संबन्धः। | वह जो, वह कौन ? प्रथम उत्पन्न हुआ सत्य-ब्रह्म, क्या है ? यह वह है। कौन है ? आदित्य; किंतु यह आदित्य कौन है ? जो यह है, यह कौन ? जो इस आदित्यमण्डलमें इसका अभिमानी पुरुष है, वह यह सत्य-ब्रह्म है; जो कि यह अध्यात्म है, अर्थात् जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वह भी ब्रह्म है—ऐसा 'च' शब्दसे सम्बन्ध लगाना चाहिये। | | तावेतावादित्याक्षिस्थौ पुरुषावेकस्य सत्यस्य ब्रह्मणः संस्थानविशेषौ यस्मात् तस्मादन्योन्यस्मिन्नितरेतरस्मिन्नादित्यश्चाक्षुषे चाक्षुषश्चादित्ये प्रतिष्ठितौ; अध्यात्माधिदैवतयोरन्योन्योपकार्योपकारकत्वात्। | क्योंकि वे ये आदित्यस्थ और नेत्रस्थ पुरुष एक सत्य-ब्रह्मके ही संस्थान (आकार) विशेष हैं, इसलिये एक-दूसरेमें अर्थात् आदित्य-पुरुष चाक्षुषमें और चाक्षुष पुरुष आदित्यमें प्रतिष्ठित हैं, क्योंकि अध्यात्म और अधिदैव पुरुष एक-दूसरेके उपकार्य और उपकारक होते हैं। | | कथं प्रतिष्ठितौ ? इत्युच्यते<br><br>रश्मिभिःप्रकाशेनानुग्रहं कुर्वन्नेष आदित्योऽस्मिंश्चाक्षुषेऽध्यात्मे प्रतिष्ठितः। अयं च चाक्षुषः प्राणै- | वे किस प्रकार प्रतिष्ठित हैं, सो बतलाया जाता है-रश्मियों अर्थात् प्रकाशके द्वारा अनुग्रह करता हुआ यह आदित्य-पुरुष इस अध्यात्म चाक्षुष पुरुषमें प्रतिष्ठित हे तथा यह चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा इस |