बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1213, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११९९ |
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| रादित्यमनुगृह्णन्नमुष्मिन्नादित्येऽधिदैवे प्रतिष्ठितः ।<br><br>सोऽस्मिञ्छरीरे विज्ञानमयो भोक्ता यदा यस्मिन् काल उत्क्रमिष्यन् भवति तदासौ चाक्षुष आदित्यपुरुषो रश्मीनुपसंहृत्य केवलेनौदासीन्येन रूपेण व्यवतिष्ठते । तदायं विज्ञानमयः पश्यति शुद्धमेव केवलं विरश्म्येतन्मण्डलं चन्द्रमण्डलमिव । तदेतदरिष्टदर्शनं प्रासङ्गिकं प्रदर्श्यते । कथं नाम पुरुषः करणीये यत्नवान् स्यादिति ।<br><br>नैनं चाक्षुषं पुरुषमुररीकृत्य तं प्रत्यनुग्रहायेते रश्मयः स्वामिकर्त्तव्यवशात् पूर्वमागच्छन्तोऽपि पुनस्तत्कर्मक्षयमनुरुध्यमाना इव नोपयन्ति न प्रत्यागच्छन्त्येनम्। अतोऽवगम्यते परस्परोपकार्योपकारकभावात् सत्यस्यैकस्यात्मनोंऽशावेताविति ॥ २ ॥ | आदित्य-पुरुषका उपकार करता हुआ इस अधिदैव आदित्य-पुरुषमें प्रतिष्ठित है।<br><br>इस शरीरमें जो यह विज्ञानमय (जीव) भोक्ता है, यह जिस कालमें उत्क्रमण करने लगता है, उस समय यह चाक्षुष आदित्य-पुरुष रश्मियोंका उपसंहार कर अपने शुद्ध औदासीन्यरूपसे स्थित हो जाता है। तब यह विज्ञानमय इस आदित्यमण्डलको चन्द्रमण्डलके समान शुद्ध—केवल अर्थात् रश्मिरहित देखता है। यहां यह प्रासंगिक अरिष्टदर्शन प्रदर्शित किया जाता है, जिससे कि किसी प्रकार पुरुष अपने कर्त्तव्यमें सयत्न रहे।<br><br>इस चाक्षुष पुरुषको स्वीकार कर उसके प्रति अनुग्रह करनेके लिये ये रश्मियां, जो स्वामीके कर्त्तव्यवश पहले आती थीं, अब उसके कर्मक्षयके पश्चात् अवरुद्ध हुई-सी इसके पास प्रत्यागमन नहीं करतीं—नहीं आतीं। अतः यह ज्ञात होता है कि परस्पर उपकार्य्य-उपकारकभाव रहनेके कारण ये दोनों एक सत्यात्माके ही अंश हैं ॥ २ ॥ |