भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1214, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1214

१२०० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

अहःसंज्ञक आदित्यमण्डलस्थ पुरुषके व्याहृतिरूप अवयव

तत्र योऽसौ, कः ?ऐसी स्थितिमें जो यह है, कौन ?

य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकग्ँ शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ३ ॥

इस मण्डलमें जो यह पुरुष है, उसका 'भूः' यह शिर है; शिर एक है और यह अक्षर भी एक है। 'भुवः' यह भुजा है; भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं; 'स्वः' यह प्रतिष्ठा ( चरण ) है; प्रतिष्ठा ( चरण ) दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं। 'अहर्' यह उसका उपनिषद् ( गूढ़ नाम ) है; जो ऐसा जानता है, वह पापको मारता है और उसे त्याग देता है ॥३॥

य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सत्यनामा तस्य व्याहृतयोऽवयवाः । कथम् ? भूरिति येयं व्याहृतिः, सा तस्य शिरः, प्राथम्यात् । तत्र सामान्यं स्वयमेवाह श्रुतिः—एकमेकसंख्यायुक्तं शिरस्तथैतदक्षरमेकं भूरिति । भुव इति बाहू द्वित्वसामान्याद् द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे । तथा स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एतेजो कि इस मण्डलमें सत्य नामवाला पुरुष है, उसके अवयव व्याहृतियां हैं। किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं—] 'भूः' ऐसी जो यह व्याहृति है, वह प्रथम होनेके कारण उसका शिर है। उनकी समानता श्रुति स्वयं ही बताती है—शिर एक अर्थात् एक संख्यावाला है, इसी प्रकार 'भूः' यह भी एक अक्षर है। दो होनेमें समानता होनेके कारण 'भुवः' यह भुजा है, दो भुजाएँ हैं और दो ही ये अक्षर हैं। तथा 'स्वः' यह प्रतिष्ठा है, दो प्रतिष्ठाएँ हैं