भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1231, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1231

ब्राह्मण १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१७


| किं च रमिति–रमिति चोक्तवान् पिता। किं पुनस्तद् रम् ? प्राणो वै रम्; कुत इत्याह प्राणे हि यस्माद् बलाश्रये सति सर्वाणि भूतानि रमन्तेऽतो रं प्राणः। सर्वभूताश्रयगुणमन्नं सर्वभूतरतिगुणश्च प्राणः। न हि कश्चिदनायतनो निराश्रयो रमते; नापि सत्यप्यायतनेऽप्राणो दुर्बलो रमते; यदा त्वायतनवान् प्राणी बलवांश्च तदा कृतार्थमात्मानं मन्यमानो रमते लोकः; “युवा स्यात् साधुयुवाऽध्यायकः” (तै० उ० २।८।१) इत्यादिश्रुतेः। | इसके सिवा ‘रम्’ यह कहा—पिताने ‘रम्’ ऐसा भी कहा, सो वह ‘रम्’ क्या है? प्राण ही ‘रम्’ है। क्यों, सो बतलाते हैं—क्योंकि बलके आश्रयभूत प्राणके रहनेपर ही सब भूत रमण करते हैं, इसलिये प्राण ‘रम्’ है। इस प्रकार अन्न समस्त भूतोंके आश्रयरूप गुणवाला है और प्राण समस्त भूतोंके रतिरूप गुणवाला। बिना आयतन अर्थात् बिना आश्रयके भी कोई रमण नहीं कर सकता और आश्रयके होनेपर भी प्राणहीन अर्थात् बलहीन भी रमण नहीं कर सकता। जिस समय प्राणी आश्रयसे युक्त और बलवान् होता है तभी अपनेको कृतार्थ मानता हुआ वह रमण करता है; जैसा कि “युवक हो, अच्छा युवक हो और विद्यावान् हो” इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है। | | इदानीमेवंविदः फलमाह— | अब श्रुति इस प्रकार जाननेवाले उपासकका फल बतलाती है— | | सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्त्यन्नगुणज्ञानात् सर्वाणि भूतानि रमन्ते प्राणगुणज्ञानाद् य एवं वेद ॥ १ ॥ | जो ऐसा जानता है, उसमें अन्नगुणका ज्ञान होनेके कारण समस्त भूत प्रवेश करते हैं तथा प्राणगुणका ज्ञान होनेके कारण समस्त भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
द्वादशमन्नप्राणब्राह्मणम् ॥ १२ ॥


बृ० उ० ७७—