भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1232, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1232

त्रयोदश ब्राह्मण

उक्थदृष्टिसे प्राणोपासना

उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदँ सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मादुक्थविद् वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ १ ॥

'उक्थ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही उक्थ है, क्योंकि प्राण ही इन सबको उत्थापित करता है। इस उपासकसे उक्थवेत्ता पुत्र उत्पन्न होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह प्राणके सायुज्य और सालोक्यको प्राप्त करता है ॥ १ ॥

| उक्थं तथोपासनान्तरम् । उक्थं शस्त्रम्; तद्धि प्रधानं महाव्रते क्रतौ । किं पुनस्तदुक्थम् ? प्राणो वा उक्थम्; प्राणश्च प्रधान इन्द्रियाणामुक्थं च शस्त्राणामत उक्थमित्युपासीत ।<br><br>कथं प्राण उक्थम् ? इत्याह— प्राणो हि यस्मादिदं सर्वमुत्थापयति; उत्थापनादुक्थं प्राणः; न ह्यप्राणः कश्चिदुत्तिष्ठति ।<br><br>तदुपासनफलमाह—उद्धास्मादेवंविद उक्थवित् प्राणविद् वीरः | इसी प्रकार उक्थ' एक अन्य उपासना है। उक्थ शस्त्र है, वही महाव्रत क्रतुमें प्रधान होता है। अच्छा तो वह उक्थ क्या है ? प्राण ही उक्थ है; प्राण इन्द्रियोंमें प्रधान है और उक्थ शस्त्रोंमें प्रधान है; इसलिये प्राण उक्थ है—ऐसी उपासना करे।<br><br>प्राण उक्थ किस प्रकार है ? सो श्रुति बतलाती है—क्योंकि प्राण ही इस सबको उठाता है; उठानेके कारण प्राण उक्थ है; क्योंकि कोई भी प्राणहीन उठ नहीं सकता।<br><br>अब श्रुति उसकी उपासनाका फल बतलाती है—इस प्रकार उपासना करनेवालेसे उक्थवित्-प्राणवित् वीर |