बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1252, कुल 1402 में से
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| १२३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
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| त्वमपदसि, यस्मान्न हि पद्यसे<br><br>नेति नेत्यात्मत्वात् ? अतोऽव्यव-<br><br>हारविषयाय नमस्ते तुरीयाय<br><br>दर्शताय पदाय परोरजसे । | हो, नहीं है, वह तू अपद् है; क्यों-<br>कि नेति-नेति स्वरूप होनेके कारण<br>तेरा ज्ञान नहीं होता; अतः<br>व्यवहारके अविषयभूत तेरे तुरीय<br>दर्शत ( दर्शनीय ) परोरजा (समस्त<br>लोकोंसे ऊपर विराजमान ) पदको<br>नमस्कार है । |
| असौ शत्रुः पाप्मा त्वत्प्राप्ति-<br>विघ्नकरोऽदस्तदात्मनः कार्यं<br>यत् त्वत्प्राप्तिविघ्नकर्तृत्वं मा<br>प्रापन्मैव प्राप्नोतु । इतिशब्दो<br>मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः । | वह शत्रु पाप तेरी प्राप्तिमें<br>विघ्न करनेवाला है। वह तेरी<br>प्राप्तिमें विघ्न करनेरूप कार्यमें<br>समर्थ न हो। यहाँ 'इति' शब्द<br>मन्त्रकी समाप्तिके लिये है। |
| यं द्विष्याद् यं प्रति द्वेषं कुर्यात्<br><br>स्वयं विद्वांस्तं प्रत्यनेनोपस्था-<br><br>नम् । असौ शत्रुरमुकनामेति<br><br>नाम गृह्णीयादस्मै यज्ञदत्तायाभि-<br><br>प्रेतः कामो मा समृद्धि समृद्धिं<br><br>मा प्राप्नोत्विति वोपतिष्ठते । न<br><br>हैवास्मै देवदत्ताय स कामः<br><br>समृध्यते । कस्मै ? यस्मा<br><br>एवमुपतिष्ठते । अहमदो देव-<br>दत्ताभिप्रेतं प्रापमिति वोप-<br>तिष्ठते । असावदो मा प्राप- | यह उपासक जिसके प्रति द्वेष<br>करता हो, उसके लिये यह<br>उपस्थान है। यह अमुक नाम-<br>वाला शत्रु-इस प्रकार यहाँ नाम<br>ले, अर्थात् इस यज्ञदत्तको इसका<br>अभिप्रेत अर्थ समृद्ध न हो अर्थात्<br>सम्पन्नताको प्राप्त न हो-ऐसा<br>कहकर उपस्थान करता है। ऐसा<br>करनेसे इस देवदत्तकी अभीष्ट<br>कामना पूर्ण नहीं ही होती है।<br>किस देवदत्तके लिये ऐसी बात<br>है ? जिसके उद्देश्यसे इस प्रकार<br>उपस्थान करता है, उसके<br>लिये । अथवा इस देवदत्तके<br>अभीष्ट अर्थको मैं प्राप्त कर लूँ-<br>इस उद्देश्यसे उपस्थान करता है।<br>'असौ' 'अदः' 'मा प्रापत्' इन |