भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1253, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1253
ब्राह्मण १४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२३९

| दित्यादित्रयाणां मन्त्रपदानां यथाकामं विकल्पः ॥ ७ ॥ | तीन मन्त्रपदोंका उपासकके इच्छानुसार विकल्प हो सकता है१ ॥ ७ ॥ |


गायत्रीके मुखविधानके लिये अर्थवाद

| गायत्र्या मुखविधानायार्थवाद उच्यते— | गायत्रीका मुखविधान करनेके लिये अर्थवाद कहा जाता है— |

एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद् गायत्रीविदब्रूथा कथँ हस्तीभूतो वहसीति मुखँ ह्यस्याः सम्राण न विदांचकारेति होवाच तस्या अग्निरैव मुखं यदि ह वा अपि बह्विवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत् संदहत्येवँ हैवैवंविद् यद्यपि बह्विव पापं कुरुते सर्वमेव तत् संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः संभवति ॥ ८ ॥

उस विदेह जनकने बुडिल आश्वतराश्विसे यही बात कही थी कि 'तूने जो अपनेको गायत्रीविद् (गायत्री-तत्त्वका ज्ञाता) कहा था, तो फिर [प्रतिग्रहके दोषसे] हाथी होकर भार क्यों ढोता है?' इसपर उसने 'हे सम्राट् ! मैं इसका मुख ही नहीं जानता था' ऐसा कहा। [तब जनकने कहा—] 'इसका अग्नि ही मुख है। यदि अग्निमें लोग बहुत-सा ईंधन रख दें तो वह उस सभीको जला डालता है। इसी प्रकार ऐसा जाननेवाला बहुत-सा पाप करता रहा हो तो भी वह उस सबको भक्षण करके शुद्ध, पवित्र, अजर, अमर हो जाता है ॥ ८ ॥

| एतद्ध किल वै स्मर्यते। तत्तत्र गायत्रीविज्ञानविषये जनको वैदेहो बुडिलो नामतोऽश्वतराश्वस्यापत्य- | उस गायत्री-विज्ञानके विषयमें ऐसा ही स्मरण भी किया जाता है- विदेह जनकने बुडिल नामसे प्रसिद्ध व्यक्तिसे, जो अश्वतराश्वके पुत्र होनेके |


१. अर्थात् वह जिसके लिये जिस वस्तुकी प्राप्ति या अप्राप्तिकी कामना रखता हो; उन्हींका इनके स्थानमें उच्चारण किया जा सकता है।