बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1256, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५
नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम १
सत्यसंज्ञक ब्रह्मका मुख ज्योतिर्मय पात्रसे आच्छादित है। हे संसारका पोषण करनेवाले सूर्यदेव ! तू उसे, मुझ सत्यधर्मके प्रति उसके दर्शनके लिये उघाड़ दे। हे पूषन् ! हे एकर्षे ! हे यम ! हे सूर्य ! हे प्राजापत्य ! अपनी किरणोंको हटा ले और तेजको समेट ले। तेरा जो अत्यन्त कल्याणमय रूप है, उसे मैं देखता हूँ। यह जो आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है, वही मैं अमृतस्वरूप हूँ। [ मुझ अमृत एवं सत्यस्वरूप आत्माका शरीरपात हो जानेपर इस शरीरके भीतरका ] प्राणवायु इस बाह्यवायुको प्राप्त हो तथा यह शरीर भस्मशेष होकर पृथ्वीको प्राप्त हो। हे प्रणवरूप एवं मनोमय क्रतुरूप अग्निदेव ! जो स्मरण करने योग्य है, उसका स्मरण कर। मैंने जो किया है, उसका स्मरण कर। हे क्रतुरूप अग्निदेव ! जो स्मरण करने योग्य है, उसका स्मरण कर; किये हुएका स्मरण कर। हे अग्ने ! हमें तू कर्मफलकी प्राप्तिके लिये शुभ मार्ग [ यानी देवयानमार्ग ] से ले चल। हे देव ! तू सम्पूर्ण प्राणियोंके समस्त प्रज्ञानोंको जाननेवाला है। हमारे कुटिल पापोंको हमसे दूर कर। हम तुझे अनेकों बार नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥
| हिरण्मयेन ज्योतिर्मयेन पात्रेण यथा पात्रेणेष्टं वस्त्वपिधीयते, एवमिदं सत्याख्यं ब्रह्म ज्योतिर्मयेन मण्डलेनापिहितमिवासमाहितचेतसामदृश्यत्वात् । तदुच्यते— सत्यस्यापिहितं मुखं मुख्यं स्वरूपं | हिरण्मय अर्थात् ज्योतिर्मय पात्रसे जिस प्रकार पात्रसे अपनी अभीष्ट वस्तु ढक दी जाती है, इसी प्रकार यह सत्यसंज्ञक ब्रह्म मानो ज्योतिर्मय मण्डलसे ढका हुआ है; क्योंकि जिनका चित्त समाहित (स्थिर एवं विशुद्ध) नहीं है, उन पुरुषोंके लिये यह अदृश्य है। वही बात कही जाती है। सत्यका मुख यानी मुख्य- |
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