बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1257, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२४३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| तदपिधानं पात्रमपिधानमिव दर्शनप्रतिबन्धकारणं तत् त्वं हे पूषन् ! जगतः पोषणात् पूषा सवितापोवृण्वपावृतं कुरु, दर्शनप्रतिबन्धकारणम् अपनयेत्यर्थः, सत्यधर्माय सत्यं धर्मोऽस्य मम सोऽहं सत्यधर्मा तस्मै त्वदात्मभूतायेत्यर्थः, दृष्टये दर्शनाय । | स्वरूप ढका हुआ है, उसके आवरक पात्रको जो ढक्कनके समान उसके दर्शनके प्रतिबन्धका कारण है, उसे हे पूषन् !—जगत्का पोषण करनेके कारण सूर्य 'पूषा' है—अपावृत कर; अर्थात् जो दर्शनमें रुकावट डालनेका कारण हो रहा है, उसे दृष्टये—दर्शनके लिये दूर कर दे । [ किस व्यक्तिके लिये ? ] जिस मेरा सत्य धर्म है, वह मैं सत्यधर्मा हूँ, उसके लिये अर्थात् तुम्हारे स्वरूपभूत मेरे लिये [ उस आवरणको हटा दो, जिससे मैं सत्यका साक्षात्कार करूँ ] । |
| पूषन्नित्यादीनि नामान्यामन्त्रणार्थानि सवितुः, एकर्ष एकश्चासावृषिश्चैकर्षिदर्शनादृषिः, स हि सर्वस्य जगत आत्मा चक्षुश्च सन् सर्वं पश्यत्येको वा गच्छतीत्येकर्षिः—“सूर्य एकाकी चरति” इति मन्त्रवर्णात् । यम सर्वं हि जगतः संयमनं त्वत्कृतम्; सूर्य सुष्ठ्वीरयते रसान् रश्मीन् प्राणान् धियो वा जगत इति । | 'पूषन्' इत्यादि नाम सूर्यको सम्बोधन करनेके लिये हैं । 'हे एकर्षे'—जो एक ऋषि हो, वह एकर्षि है। दर्शन करनेके कारण वह ऋषि है; क्योंकि वही सम्पूर्ण जगत्का आत्मा और नेत्र होकर सबको देखता है । अथवा वह अकेला ही चलता है, इसलिये एकर्षि है, जैसा कि “सूर्य अकेला चलता है” इस मन्त्रवर्णसे ज्ञात होता है । 'हे यम !'—क्योंकि सम्पूर्ण जगत्का संयमन तेरा किया हुआ ही है। 'हे सूर्य !'—जगत्के रस, रश्मि, प्राण ओर बुद्धिको सुष्ठु—सम्यक् प्रकारसे प्रेरित |