बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1258, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ ] |
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| प्राजापत्य प्रजापतेरीश्वरस्यापत्यं हिरण्यगर्भस्य वा हे प्राजापत्य व्यूह विगमय रश्मीन्। समूह संक्षिपात्मनस्तेजो येनाहं शक्नुयां द्रष्टुम्। तेजसा ह्यपहतदृष्टिर्न शक्नुयां तत्स्वरूपमञ्जसा द्रष्टुम्, विद्योतन इव रूपाणाम्; अतः उपसंहर तेजः।<br><br>यत्ते तव रूपं सर्वकल्याणानामप्यतिशयेन कल्याणं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि, पश्यामो वयं वचनव्यत्ययेन। योऽसौ भूर्भुवःस्स्वर्व्याहृत्यवयवः पुरुषः, पुरुषाकृतित्वात् पुरुषः, सोऽहमस्मि भवामि। अहरहमिति चोपनिषद उक्तत्वाद्रादित्यचाक्षुषयोस्तदेवेदं | करता है, इसलिये सूर्य है। 'हे प्राजापत्य'—प्रजापति अर्थात् ईश्वर अथवा हिरण्यगर्भके पुत्र होनेके कारण हे प्राजापत्य! रश्मियोंको 'व्यूह'—निवृत्त कर। और अपने तेजको 'समूह'—समेट ले, जिससे मैं सत्य-ब्रह्मको देख सकूँ। जिस प्रकार बिजलीकी चमकमें मनुष्य रूपोंको नहीं देख सकते, उसी प्रकार तेरे तेजसे दृष्टि नष्ट हो जानेके कारण मैं तेरे स्वरूपको साक्षात् नहीं देख सकता; अतः अपने तेजका उपसंहार कर।<br><br>तेरा जो सम्पूर्ण कल्याणोंमें अतिशय कल्याणमय कल्याणतम रूप है, तेरे उस रूपको मैं देखता हूँ। 'पश्यामो वयम्' इस प्रकार १वचनव्यत्ययके द्वारा बहुवचन करके 'हम देखते हैं' ऐसा अर्थ समझना चाहिये। यह जो 'भूर्भुवः स्वः' इन व्याहृतिरूप अवयवोंवाला पुरुष है, जो पुरुषाकार होनेके कारण पुरुष है, वह मैं ही हूँ। आदित्य और चाक्षुष पुरुषकी 'अहर्' और 'अहम्' ये उपनिषदें (गुह्यनाम) कही गयी हैं, अतः यहाँ उन्हींका परामर्श |
१. 'व्यत्ययो बहुलम्' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार।