बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1297, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२८१
| सोपालम्भं पुत्रस्य वचः श्रुत्वाह पिता कथं केन प्रकारेण तव दुःखमुपजातं हे सुमेधः ! शोभना मेधा यस्येति सुमेधाः । शृणु मम यथा वृत्तम्—पञ्च पञ्चसंख्याकान् प्रश्नान् मा मां राजन्यबन्धू राजन्या बन्धवो यस्येति; परिभववचनमेतद्राजन्यबन्धुरिति, अप्राक्षीत् पृष्टवांस्ततस्तेषामन्नैकंचनैकमपि न वेद न विज्ञातवानस्मि । कतमे ते राज्ञा पृष्टाः प्रश्नाः' इति पित्रोक्तः पुत्रः 'इमे ते' इति ह प्रतीकानि मुखानि प्रश्नानामुदाजहारोदाहृतवान् ॥ ३ ॥ | पुत्रका उपालम्भयुक्त वचन सुनकर पिताने कहा, 'हे सुमेध ! तुझे किस प्रकार दुःख उत्पन्न हुआ है।' जिसकी सुन्दर मेधाशक्ति होती है, उसे सुमेधा कहते हैं। [पुत्र]-'मेरे साथ जैसा हुआ है; सो सुनिये-मुझसे एक राजन्य-बन्धु (क्षत्रबन्धु) ने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता।' जिसके राजन्य (क्षत्रिय) बन्धु हों, उसे राजन्यबन्धु कहते हैं, यह राजन्यबन्धु तिरस्कारसूचक वचन है। 'राजाके द्वारा पूछे हुए वे प्रश्न कौन-से थे?' इस प्रकार पिताके पूछनेपर पुत्रने 'वे ये थे' ऐसा कहकर उन प्रश्नोंके प्रतीक-मुख (संकेत) बतलाये ॥ ३ ॥ |
पिता आरुणिका उनके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बताकर उसे शान्त करना और उनका उत्तर जाननेके लिये प्रवाहणके पास आना
स होवाच तथा नस्त्वं तात जानीथा यथा यदहं किञ्च वेद सर्वमहं तत्तुभ्यमवोचं प्रेहि तु तत्र प्रतीत्य ब्रह्मचर्यं वत्स्याव इति भवानेव गच्छत्विति स आजगाम गौतमो यत्र प्रवाहणस्य जैवलेरास तस्मा आसनमाहृत्योदकमाहारयाञ्चकाराथ हास्मा अर्घ्यं चकार तँहोवाच वरं भगवते गौतमाय दद्म इति॥४॥
बृ० उ० ८१-