बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1298, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
|---|
उस पिताने कहा, 'हे तात ! तू हमारे कथनानुसार ऐसा समझ कि हम जो कुछ जानते थे वह सब हमने तुझसे कह दिया था। अब हम दोनों वहीं चलें और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उसके यहाँ निवास करेंगे।' [पुत्र—] 'आप ही जाइये।' तब वह गौतम जहाँ जैवलि प्रवाहणकी बैठक थी, वहां आया। उसके लिये आसन लाकर राजाने जल मँगवाया और उसे अर्घ्यदान किया। फिर बोला, 'मैं पूज्य गौतमको वर देता हूँ'१ ॥ ४ ॥
| स होवाच पिता पुत्रं क्रुद्धमुपशमयँस्तथा तेन प्रकारेण नोऽस्मांस्त्वं हे तात वत्स जानीथा गृह्णीथा यथा यदहं किञ्च विज्ञानजातं वेद सर्वं तत् तुभ्यमवोचमित्येव जानीथाः; कोऽन्यो मम प्रियतरोऽस्ति त्वत्तो यदर्थं रक्षिष्ये ? अहमप्येतन्न जानामि यद् राज्ञा पृष्टम् । तस्मात् प्रेहागच्छ तत्र प्रतीत्य गत्वा राज्ञि ब्रह्मचर्यं वत्स्यावो विद्यार्थमिति ।<br><br>स आह—भवानेव गच्छत्विति, नाहं तस्य मुखं निरीक्षितुमुत्सहे ।<br><br>स आजगाम गौतमो गोत्रतो गौतम आरुणिर्यत्र प्रवाहणस्य जैवलेरासनमास्थायिका; षष्ठी- | क्रुद्ध पुत्रको शान्त करनेके लिये उस पिताने कहा, 'हे तात ! हे वत्स ! तू हमसे इस प्रकार समझ कि जो कुछ विज्ञान मैं जानता था, वह सब मैंने तुझसे कह दिया था—ऐसा ही तू जान । भला तुझसे अधिक प्रिय मेरा और कौन है जिसके लिये उसे छिपाऊँगा । राजाने जो पूछा है, वह तो मैं भी नहीं जानता । अतः आ, वहाँ चलकर हम दोनों विद्योपार्जनके लिये राजाके यहाँ ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक निवास करेंगे।' उस (पुत्र) ने कहा, 'आप ही जाइये, मैं तो उसका मुँह भी नहीं देख सकता ।'<br><br>वह गौतम-गोत्रतः गौतम आरुणि, जहाँ प्रवाहण जैवलिका आस-आसन आस्थायिका अर्थात् बैठक थी, वहाँ आया । 'प्रवाहणस्य जैवलेः' ये दो |
१. अर्थात् आप जिस प्रयोजनसे यहाँ पधारे हैं, वह कहिये; मैं उसको पूर्ति करूँगा।