बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1299, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1299
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२८३
| द्वयं प्रथमास्थाने; तस्मै गौतमायागतायासनमनुरूपमाहृत्योदकं भृत्यैराहारयाञ्चकार; अथ हास्मा अर्घ्यं पुरोधसा कृतवान् मन्त्रवन्मधुपर्कं च; कृत्वा चैवं पूजां तं होवाच वरं भगवते गौतमाय तुभ्यं दद्म इति गोऽश्वादिलक्षणम् ॥ ४ ॥ | षष्ठी प्रथमाके स्थानमें हैं¹। अपने पास आये हुए उस गौतमके लिये राजाने उचित आसन देकर सेवकोंसे जल मँगवाया और फिर पुरोहितद्वारा अर्घ्य और मन्त्रयुक्त मधुपर्क कराया। इस प्रकार पूजाकर उसने गौतमसे कहा, 'मैं आप भगवान् गौतमको गौ-अश्वादिरूप वर देता हूँ' ॥ ४ ॥ |
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आरुणिका प्रवाहणसे अपने पुत्रसे पूछी हुई बात कहनेकी प्रार्थना करना
स होवाच प्रतिज्ञातो म एष वरो यां तुकुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तां मे ब्रूहीति ॥ ५ ॥
उसने कहा, 'आपने मुझे जो वर देनेके लिये प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आपने कुमारसे जो बात पूछी थी वह मुझसे कहिये' ॥ ५ ॥
| स होवाच गौतमः प्रतिज्ञातो मे ममैष वरस्त्वयास्यां प्रतिज्ञायाम् दृढी कुर्वात्मानम्, यां तु वाचं कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते समीपे वाचमभाषथाः प्रश्नरूपां तामेव मे ब्रूहि स एव नो वर इति ॥५॥ | उस गौतमने कहा, 'आपने इस प्रतिज्ञामें मुझे यह वर देनेकी प्रतिज्ञा की है—'कुमार अर्थात् मेरे पुत्रके समीप आपने प्रश्नरूप जो बात कही थी, वही आप मुझसे कहिये, वही मेरा वर है। यह वर देनेके लिये अब आप अपनेको सुस्थिर कीजिये' ॥ ५ ॥ |
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१. क्योंकि 'आस' यह क्रियापद है, अतः 'प्रवाहणः जैवलिः' यह उसका कर्ता होना चाहिये। षष्ठी होनेके कारण ही 'आस' का अर्थ 'आसन' किया गया है।