बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1300, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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प्रवाहणका उसे दैव वर बताकर अन्य मानुष वर माँगनेके लिये कहना
स होवाच दैवेषु वै गौतम तद् वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति ॥ ६ ॥
उसने कहा, 'गौतम ! वह वर तो दैव वरोंमेंसे है; तुम मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे कोई वर माँगो' ॥ ६ ॥
| स होवाच राजा दैवेषु वरेषु तद् वै गौतम यस्त्वं प्रार्थयसे मानुषाणामन्यतमं प्रार्थय वरम् ॥ ६ ॥ | उस राजाने कहा, 'गौतम ! तुम जो वर मांगते हो, वह तो देव वरोंमेंसे है। मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे कोई वर माँगो' ॥ ६ ॥ |
आरुणिका आग्रह और प्रवाहणकी स्वीकृतिसे आरुणिद्वारा वाणीमात्रसे उसका शिष्यत्व स्वीकार करना
स होवाच विज्ञायते हास्ति हिरण्यस्यापात्तं गोअश्वानां दासीनां प्रवाराणां परिदानस्य मा नो भवान् बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यवदान्यो भूदिति स वै गौतम तीर्थेनेच्छासा इत्युपैम्यहं भवन्तमिति वाचा ह स्मैव पूर्व उपयन्ति स होपायनकीर्त्योवास ॥ ७ ॥
उस गौतमने कहा, आप जानते हैं, वह तो मेरे पास है। मुझे सुवर्णकी प्राप्ति तथा गौ, अश्व, दासी, परिवार और परिधानकी भी प्राप्ति है। आप महान्, अनन्त और निःसीम धनके दाता होकर मेरे लिये अदाता न हों।' [राजा--] 'तो गौतम ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे उसे पानेकी इच्छा करो।' (गौतम--) 'अच्छा, मैं आपके प्रति शिष्यभावसे उपसन्न (प्राप्त) होता हूँ। पहले ब्राह्मणलोग वाणीसे ही क्षत्रियादिके प्रति उपसन्न होते रहे हैं।' इस प्रकार उपसत्तिका वाणीसे कथनमात्र करके गौतम वहां रहने लगा [सेवा आदिके द्वारा नहीं] ॥ ७ ॥