बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1305, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२८९ |
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हे गौतम ! यह लोक ( द्युलोक ) ही अग्नि है। आदित्य ही उसका समिध् (ईंधन) है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गार हैं, अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं। उस इस अग्निमें देवगण श्रद्धाको हवन करते हैं; उस आहुतिसे सोम राजा होता है ॥ ६ ॥
| असौ द्यौर्लोकोऽग्निर्वै गौतम; द्युलोकेऽग्निदृष्टिरग्नौ विधीयते, यथा योषित्पुरुषयोः; तस्य द्युलोकाग्नेरादित्य एव समित् समिन्धनात्; आदित्येन हि समिध्यतेऽसौ लोकः ।<br><br>रश्मयो धूमः समिध उत्थानसामान्यात्, आदित्याद् हि रश्मयो निर्गताः; समिधश्च धूमो लोक उत्तिष्ठति । अहरर्चिः प्रकाशसामान्यात्; दिशोऽङ्गारा उपशमसामान्यात्; अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गवद् विक्षेपात् ।<br><br>तस्मिन्नेतस्मिन्नेवंगुणावशिष्टे द्युलोकाग्नौ देवा इन्द्रादयः श्रद्धां | हे गौतम ! यह द्युलोक अग्नि है। स्त्री और पुरुषके समान अग्नि न होनेपर भी द्युलोकमें अग्निदृष्टिका विधान किया जाता है। उस द्युलोकरूप अग्निको सम्यक् प्रकारसे दीप्त करनेवाला होनेसे आदित्य उसका समिध् है, क्योंकि आदित्यसे ही उस लोकका सम्यक् प्रकारसे दीपन (प्रकाशन) होता है।<br><br>किरणें धूम हैं; क्योंकि जिस प्रकार ईंधनसे धुआं उठता है, उसी प्रकार आदित्यरूपी ईंधनसे उठनेमें इन किरणोंकी धूमसे समानता है; कारण, आदित्यसे ही किरणें निकलती हैं और लोकमें समिध् (ईंधन) से धूम निकलता है। प्रकाशमें समानता होनेके कारण दिन ज्वाला है; उपशममें समानता होनेसे दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा विस्फुलिङ्गोंके समान बिखरी हुई होनेके कारण अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं।<br><br>ऐसे गुणोंसे युक्त उस इस द्युलोकरूप अग्निमें इंद्रादि देवगण |