बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1306, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| [आहुत्यादि-स्वरूपविचारः]<br>जुह्वत्याहुतिद्रव्यस्थानीयां प्रक्षिपन्ति। तस्या आहुत्या आहुतेः सोमो राजा पितॄणां ब्राह्मणानां च संभवति।<br><br>तत्र के देवाः १ कथं जुह्वति ? किं वा श्रद्धाख्यं हविः १ इत्यत उक्तमस्माभिः सम्बन्धेनैत्थैवैतयोत्थ्वमुत्क्रान्तिमित्यादि। पदार्थषट्कनिर्णयार्थमग्निहोत्र उक्तम्—ते वा एते अग्निहोत्राहुती हुते सत्यावुत्क्रामतः; ते अन्तरिक्षमाविशतः; ते अन्तरिक्षमाहवनीयं कुर्वाते वायुं समिधं मरीचीरेव शुक्रामाहुतिम्; ते अन्तरिक्षं तर्पयतः; ते तत उत्क्रामतः; ते दिवमाविशतः; ते दिवमाहवनीयं कुर्वाते आदित्यं समिधमित्येवमाद्युक्तम्। | आहुतिद्रव्यस्थानीय श्रद्धाको हवन करते अर्थात् डालते हैं। उस आहुतिसे पितरों और ब्राह्मणोंका राजा सोम उत्पन्न होता है।<br><br>तहाँ देवता कौन हैं ? वे किस प्रकार हवन करते हैं ? और श्रद्धासंज्ञक हवि भी क्या हैं ?¹ इन सब बातोंका विचार करना है-इसीसे हमने इस ब्राह्मणके सम्बन्ध-भाष्यमें कहा था कि 'तू इन सायंकालिक, प्रातःकालिक अग्निहोत्रकी दोनों आहुतियोंकी न तो उत्क्रान्तिको जानता है' इत्यादि। इसी प्रकार उत्क्रान्ति आदि छः पदार्थोंके निर्णयके लिये अग्निहोत्रप्रकरणमें कहा गया है—वे ये अग्निहोत्रकी दोनों आहुतियाँ हवन की जानेपर उत्क्रमण करती (ऊपर उठती) हैं; वे अन्तरिक्षमें प्रवेश करती हैं; वे अन्तरिक्षको ही आहवनीय अग्नि करती हैं, वायुको समिध् करती हैं और किरणोंको ही शुक्ल आहुति करती हैं; वे अन्तरिक्षको तृप्त करती हैं; वे उससे भी ऊपर जाती हैं; वे द्युलोकमें प्रवेश करती हैं; वहाँ वे द्युलोकको आहवनीय बनाती हैं और आदित्यको 'समिध्'; इत्यादि प्रकारसे वहाँ कहा गया है। |
१. क्योंकि न तो इन्द्रादि देवताओंका कर्ममें अधिकार है, न द्युलोकादिमें हवन किया जा सकता है और न श्रद्धामें द्रव्यत्व है।